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yadavinod

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सोमवार, 1 नवंबर 2010

उनका बचपन
आए है दुनिया में
वे भी औरों   की तरह
फिर भी क्यों घुसे हैं
वे हाथ जूठे कप
और केतली में
क्यों निकालने को 
मजबूर हैं वे हाथ
औरों की घर की 
गंदगी जबकि
उनके खुद के झुग्गी झौंपड
खड़े पड़े है गंदगी में 
क्यों है उनका ? बचपन ऐसा
या हम तसल्ली  दे लेते हैं
खुद को कि
उनका भाग्य ? ही ऐसा है

1 टिप्पणी:

Amrita Tanmay ने कहा…

काश ! सब ऐसा ही सोचते और समझते ........ अच्छी रचना .