उनका बचपन
आए है दुनिया में
वे भी औरों की तरह
फिर भी क्यों घुसे हैं
वे हाथ जूठे कप
और केतली में
क्यों निकालने को
मजबूर हैं वे हाथ
औरों की घर की
गंदगी जबकि
उनके खुद के झुग्गी झौंपड
खड़े पड़े है गंदगी में
क्यों है उनका ? बचपन ऐसा
या हम तसल्ली दे लेते हैं
खुद को कि
उनका भाग्य ? ही ऐसा है
1 टिप्पणी:
काश ! सब ऐसा ही सोचते और समझते ........ अच्छी रचना .
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