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शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

ओढणी

सतरंगी ओढणी
सुपातर बीन्दनी
ठेठ देहाती रंग
ओढ़नी साक्षी है
जिजीविषा की जंग की
ओढ़नी को खुद से
ज्यादा लगाव है
अपने पास के
दूर के रिश्तों का
जिनके लिए पचती है
रैन और दिवस
क्योंकि
उसे मालूम है
उसकी ओढ़नी के रंग
भी उन रिश्तों के कारण हैं
जिस दिन नहीं रहेंगे
ओढणी के रिश्ते
बदरंग हो जायेंगे
उस ओढणी के रंग

1 टिप्पणी:

Amrita Tanmay ने कहा…

भावपूर्ण , अच्छी रचना ...... बधाई ..........