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सोमवार, 9 मार्च 2015

मीटरगेज ट्रेन। टकटक टकटक की आवाज़ लयबद्ध संगीत सी लगती।ट्रेन के चलते ही खाने के लिए बैठ जाना। फिर टकटक वाला संगीत सुनते झपकियाँ आना पर नहीं सोने की ज़िद । स्टीम इंजन के धुएं के साथ आते कोयले के बारीक टुकड़ों का आँख की किरकिरी बन जाना और फिर आँख रगड़ रगड़ कर और लाल कर लेना। फिर उसके बाद डांट खाना। फर्स्ट क्लास का डिब्बा। उसका हरे रंग के फोम या रग्ज़िन् कवर बर्थ। उठो बैठो लेटो। विभाग की तरफ़ से फ्री पास और रिजर्वेशन। पापा ने बताया था। टकटक की आवाज़ चालीस सेकण्ड्स में जितनी बार आए लगभग उतनी ही ट्रेन की स्पीड होती है । टुकड़ों में जाना क्योंकि सीधी ट्रेन नहीं थी। पापा निकट सम्बन्धी के यहां पढ़ रहे बेटे को छोड़ने जा रहे थे। सब खुश थे कि इस बहाने मिलना जुलना भी हो गया था । अगले दिन ट्रेन से पापा की वापसी के समय सम्बन्धी के साथ स्टेशन पर आए। ट्रेन की इन्तज़ार में बातें करते रहे । जैसे ही ट्रेन रवाना हुई। ट्रेन की तरफ हाथ करके आँखों से पानी के साथ जैसे भीतर का बाँध टूटा और ज़ोर से चीख पड़ा। मैं भी पापा के साथ जाऊंगा। ट्रेन जा चुकी थी। पापा देख नहीं पाये थे।
छत्तीस साल बीत गए। टुकड़ों में नहीं जाना पड़ता। सीधी ट्रेन। यहाँ बैठो। वहां उतरो। स्टीम इंजन की जगह डीजल इंजन ने ले ली है। मीटर गेज ब्रॉड गेज में बदल चुकी है। टकटक का संगीत भी नहीं बजता क्योंकि रेलवे लाइन के जोड़ों में अब वैल्डिंग की जाने लगी है जिससे अनावश्यक शोर होता नही है। बेटी उच्च शिक्षा के लिए उस शहर से आगे और भी बड़े शहर में हॉस्टल में रह रही है। फ़ोन की सुविधा हो गयी है। पापा मम्मी भाइयों से बातें भी हो जाती है। बेटी से मिलने पापा आये हैं। "चलो पापा चाय पीकर आते हैं। चलो खाना खा लेते है। पापा ये हमारे साथ पढ़ने वाले हैं। देखो यहाँ हमारी क्लासेज लगती है। देखो ये बैंक है।..."बातें ख़त्म नहीं होतीं। दिन से रातें और फिर रातों से दिन होते आये हैं लेकिन बातें न कभी खत्म हुई हैं और न ही खत्म होंगी। होनी भी नहीं चाहिए लेकिन समय चलने का हो गया था। "ठीक है बेटा गाड़ी का टाइम हो रहा है। मैं अब निकल लूँ?  बेटी मेन एंट्री एग्जिट तक छोड़ने आई है। "नमस्ते पापा।"
"नमस्ते बेटा।" कहते हुए पापा ने बेटी के सर पर दोनों हाथ एक साथ रखे और झटके के साथ ऑटो रिक चल पड़ा। बेटी उदास थी। पापा उसकी उदासी नहीं देख पाये थे।©

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