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yadavinod

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सोमवार, 9 मार्च 2015

प्रोफेसर अंग्रेजी के थे। अपने विषय के ज्ञाता। न जाने कितनी बार ट्रेन की यात्रा की होगी। उतनी बार तो कम से कम डिब्बे में चढ़े उतरे होंगे। उस दिन जिस स्टेशन पर उतरना था उससे कुछ पहले झपकी आ गयी। ट्रेन अपने दो मिनट के ठहराव से दो चार मिनट ज़्यादा ही रुकी और चल दी थी। चलने के झटके से आँख खुली । हड़बड़ी में बैग उठाया। दरवाजे तक पहुँचते गाड़ी की रफ़्तार बढ़ने लगी थी।    चेन पुल भी कर सकते थे।कुछ क्षण गाड़ी के साथ दौड़ना भी होता है संतुलन बनाने के लिए। अपनी गति को ट्रेन की गति के साम्य और फिर धीरे धीरे कम करके ठहराव की ओर। लेकिन  विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञान के अभाव में प्लेटफार्म के अंतिम सिरे के करीब सीधा कूद पड़े। चोट खा बैठे। ©

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