सरकारी निःशुल्क दवा योजना लागू होने के बाद स्वाभाविक तौर पर अस्पताल में आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ गयी थी। संख्या और बढ़ाने की जुगत में अस्पताल के निर्धारित समय बाद भी कार्मिक फ़र्ज़ी पर्चियां काटने में लगे रहते थे। आउटडोर पेशेंट की पर्ची 10 रूपये में कटती थी पर एवज़ में जो दवाइयां इशू होती थी उनकी क़ीमत ज़्यादा होने से वहां के कार्मिकों को ये फ़ायदे का सौदा लगता था। गाँव मोहल्लों में कथित डॉक्टरों के यहां वे दवाइयाँ आसानी से उपलब्ध हो जाती थी। एक टेब्लॉइड के कथित संवाददाता को यह जानकारी कई दिन से थी। किसी बात पर अस्पताल के कार्मिकों से उसकी तू मैं हो गयी थी। अगले दिन उसके अख़बार में ये खबर आ गयी कि "निजी चिकित्सक दे रहे निशुल्क सरकारी दवाइयाँ"
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