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सोमवार, 9 मार्च 2015

शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान के आसपास के संपेरे परिवारों के भगवा कपड़धारी बच्चे दोपहर भोजन के वक़्त मंडराते रहते थे। उन्हें वहां बचा हुआ भोजन या कई बार पूरा डिब्बा मिल जाता था क्योंकि कभी कई शिक्षकों के व्रत उपवास होते थे और खून में जो घूमने फिरने की आज़ादी थी उसके वशीभूत उनका स्वच्छन्द विचरण भी ऐसे ही सम्भव था। प्रशिक्षण अक्सर चलते ही रहते थे। इस बार के प्रशिक्षण अर्थियों में नवनियुक्त शिक्षकों की बहुतायत थी। उनमे से भी कुछ अधिक  जोशीले कालबेलिया बच्चों से वे ख़ाली समय पूछताछ में शोधरत से थे।
"तुम्हे पढ़ना चाहिए"
"चलो तुम्हारा नाम लिखवाते हैं" कहते हुए उन्हें लेकर नज़दीक के सरकारी स्कूल की ओर चल पड़े।
"सर इनका नाम लिखो।"
"इनके नाम तो लिखे हुए हैं।" कई वर्षों की सेवा से अनुभवी शिक्षक का जवाब था।
इधर जोशीले और अनुभवी शिक्षक बच्चों की शिक्षा पर सैद्धान्तिक और व्यावहारिक वास्तविकता पर चर्चा में व्यस्त थे कि जोशीले शिक्षकों ने देखा चर्चा के केंद्र बिंदु यानि कालबेलिया परिवारों के बच्चे वहां से खिसक चुके थे और नवनियुक्त जोशीले शिक्षकों की पकड़ से भी काफी दूर जा चुके थे।
अनुभवी शिक्षक को यह अनुभव उनके बड़े भाई बहनों से ही नहीं, उनके पिता चाचा के समय से ही था।©

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