धरती पे जगह नहीं तो आसमान अपना है। ऊपर और ऊपर, ईंटे चिनते जाओ। अखबार में स्पेस उतना है तो कमाई के लिए और स्पेस निकालो । फॉन्ट छोटा करते जाओ। रेल ने भी तरीका निकाला। यूनिगेज के चलते डिब्बे बड़े हो गए। भीड़ भी उसी अनुपात में बल्कि उससे भी ज़्यादा । डिब्बों में मीटरगेज में जहां एक केबिन चार बर्थ का होता था वहीं ब्रॉडगेज के डिब्बों में आठ। किसी स्टेशन पर ट्रेन रुके तो चढ़ने उतरने वाले गैलरी में खड़े हों तो जैसे दम घुटने लगता। बमुश्किल एक व्यक्ति वहां खड़ा हो सकता है। यदि सामने से आने वाले को गुज़रने देना हो तो समकोण पर घूमो या पास के केबिन में घुसो। ऐसे में एक गाँव के कुनबे के परिवार के लोग एक साथ हों तो कब्ज़ा सच्चा झगड़ा झूठा। शब्दों की जैसे अँधेरी चलती। कुछ जो छन के आते हैं अनचाहे शब्द। क्या अर्थ क्या अनर्थ। मुंह चलते रहना चाहिए। चाहे कुछ चबाते खाते रहो या बात बिना बात बोलना। जैसे बोलने वाला युग हो गया। जिसे देखो बोल रहा है। चाहे ज़रूरत हो या नही मगर बोलना बदस्तूर जारी है। अजीबोगरीब स्थिति। बोलना ही जारी है। आमने सामने नहीं तो सेलफ़ोन पर ,लेकिन बोलना ज़रूरी है और वही जारी है। बोलने वाले हुक्काम भी शायद इसीलिए भाने लगे हों यह भी शोध का विषय हो सकता हो।
"हैप्पी बर्थडे टू...
ट्रेन में जन्मदिन मनने लगा है। केक कटा है। बंट रहा है। हाँ पहले से तैयारी होगी। तब ही सारा तामझाम लाया गया होगा।
"चलो अब डांस करेंगे।"
"लादेन चलाओ"
कोई गाना लादेन ?
".....तेरा बापू है लादेन तां नहीं"
सच में गाना लादेन शब्द लिए है।
"अरे सुम्पि थोडा धीरे भई और भी लोग हैं डिब्बे में,कोई घर में थोड़ी बैठे हो।"
उसी यात्रासमूह का एक बुजुर्ग बोला। पर सभी युवा वर्ग जो डांस नाचण में मशगूल था या मदहोश था ने उस राय मशवरा सुझाव फरियाद को सिर्फ दृष्टि से ही रिजेक्ट कर दिया था। यहाँ बोलने वाले माहौल में भी कोई नही बोला था। ताज्जुब था। दस के करीब समय हो गया था। टी टी ई टिकट आई डी चेक करने आ गया था। बर्थ कन्फर्म ही थी। टी टी से पूछ ही लिया। "ये शोर शराबा कहाँ तक जायेगा?"
"बस आधे घण्टे और। आज त्यौहार का दिन है कुछ कह भी नहीं सकते।" कहते हुए टी टी ई भी जैसे बचाव की मुद्रा में था।
गाड़ी आधे घण्टे बाद किसी स्टेशन पर रुकी तो जैसे गाड़ी का कोच आधे से ज़्यादा ख़ाली हो गया था।
"अरे पार्टी यार वो जो थी ना बन्दी लगता है यार बहुत पहले से उसको जानता हूँ। अरे यार वो तो देखे ही जा रही थी। मैं कोशिश कर रहा था कि नंबर दे दे। बात कैसे करता यार? उसके फ़ोन पे किसी का फ़ोन आया था। वो नम्बर बता रही थी। वो नम्बर मैने नोट कर लिया। पर यार वो अपना नम्बर क्यों बताएगी? पर जो बताया है होगा तो उसके किसी जानकार ही। मैने देख लिया वो नम्बर पे व्हाट्स एप पे है।" अपने सवाल अपने ही जवाब। वह अब चुप हो गया।
"यार बन्दे कहने में जल्दी से नही आते बन्दी आ जाती है। मैने सब देखा है। मै चेन स्मोकर था। वोदका की मुझे वोमिट हो गयी। बन्द कर दी। मैं अपनी नज़र में खुद गिर गया था। फर्स्ट सेम सेकंड सेम । उसकी मम्मी ने उसके भाई ने हमारी फ़ोटो उसके लैप्पी पे देखी है। वो कुछ नहीं बोलते ।उसने शायद कोई बात छिपाई नही है। मुझे बताया नहीं पर मुझे लगता है उसने बता रखा है।" दूसरा अपनी बारी का भरपूर फ़ायदा उठा रहा था।... बाते या बकवास ख़त्म नहीं हो रही थीं। मुंह बस बोले जा रहे थे।
ख़ाली हो गयी बर्थों पर वेटिंग या अगले स्टेशनों से रिजर्वेशन करवाने वाले पैसेंजर्स आने लगे थे। बोलने वालों का शायद यह अहसास ख़त्म हो गया था कि कम बोलने वाले मुंह अभी भी अस्तित्व में हैं और सुनने वाले कान अभी भी मौजूद हैं और सोच भी ऐसी बाक़ी है जो इस तरह बेहिसाब बोलने वालों पर तरस खाती है कि कौन सी बात कहाँ कहनी है का शऊर कौन बताएगा।©
"हैप्पी बर्थडे टू...
ट्रेन में जन्मदिन मनने लगा है। केक कटा है। बंट रहा है। हाँ पहले से तैयारी होगी। तब ही सारा तामझाम लाया गया होगा।
"चलो अब डांस करेंगे।"
"लादेन चलाओ"
कोई गाना लादेन ?
".....तेरा बापू है लादेन तां नहीं"
सच में गाना लादेन शब्द लिए है।
"अरे सुम्पि थोडा धीरे भई और भी लोग हैं डिब्बे में,कोई घर में थोड़ी बैठे हो।"
उसी यात्रासमूह का एक बुजुर्ग बोला। पर सभी युवा वर्ग जो डांस नाचण में मशगूल था या मदहोश था ने उस राय मशवरा सुझाव फरियाद को सिर्फ दृष्टि से ही रिजेक्ट कर दिया था। यहाँ बोलने वाले माहौल में भी कोई नही बोला था। ताज्जुब था। दस के करीब समय हो गया था। टी टी ई टिकट आई डी चेक करने आ गया था। बर्थ कन्फर्म ही थी। टी टी से पूछ ही लिया। "ये शोर शराबा कहाँ तक जायेगा?"
"बस आधे घण्टे और। आज त्यौहार का दिन है कुछ कह भी नहीं सकते।" कहते हुए टी टी ई भी जैसे बचाव की मुद्रा में था।
गाड़ी आधे घण्टे बाद किसी स्टेशन पर रुकी तो जैसे गाड़ी का कोच आधे से ज़्यादा ख़ाली हो गया था।
"अरे पार्टी यार वो जो थी ना बन्दी लगता है यार बहुत पहले से उसको जानता हूँ। अरे यार वो तो देखे ही जा रही थी। मैं कोशिश कर रहा था कि नंबर दे दे। बात कैसे करता यार? उसके फ़ोन पे किसी का फ़ोन आया था। वो नम्बर बता रही थी। वो नम्बर मैने नोट कर लिया। पर यार वो अपना नम्बर क्यों बताएगी? पर जो बताया है होगा तो उसके किसी जानकार ही। मैने देख लिया वो नम्बर पे व्हाट्स एप पे है।" अपने सवाल अपने ही जवाब। वह अब चुप हो गया।
"यार बन्दे कहने में जल्दी से नही आते बन्दी आ जाती है। मैने सब देखा है। मै चेन स्मोकर था। वोदका की मुझे वोमिट हो गयी। बन्द कर दी। मैं अपनी नज़र में खुद गिर गया था। फर्स्ट सेम सेकंड सेम । उसकी मम्मी ने उसके भाई ने हमारी फ़ोटो उसके लैप्पी पे देखी है। वो कुछ नहीं बोलते ।उसने शायद कोई बात छिपाई नही है। मुझे बताया नहीं पर मुझे लगता है उसने बता रखा है।" दूसरा अपनी बारी का भरपूर फ़ायदा उठा रहा था।... बाते या बकवास ख़त्म नहीं हो रही थीं। मुंह बस बोले जा रहे थे।
ख़ाली हो गयी बर्थों पर वेटिंग या अगले स्टेशनों से रिजर्वेशन करवाने वाले पैसेंजर्स आने लगे थे। बोलने वालों का शायद यह अहसास ख़त्म हो गया था कि कम बोलने वाले मुंह अभी भी अस्तित्व में हैं और सुनने वाले कान अभी भी मौजूद हैं और सोच भी ऐसी बाक़ी है जो इस तरह बेहिसाब बोलने वालों पर तरस खाती है कि कौन सी बात कहाँ कहनी है का शऊर कौन बताएगा।©
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