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रविवार, 15 मार्च 2015

युवा वर्ग में प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए सनक सवार देखता तो ख़ुशी होती कि कुछ बदलाव लाना चाहते हैं आम लोगों के जनजीवन में। कोचिंग सेंटर इस भावना का खूब दोहन करते। जो ख़ुद कामयाब ना हो पाए वे दूसरों की कामयाबी के संवेदक बने हुए थे। राजकीय संस्थानों में कार्यरत शिक्षक भी ऐसे कोचिंग सेंटर्स में कोचिंग देने सरे आम जाते थे लेकिन उनका यह जाना चोरी छिपे ही कहलाता था क्योंकि विभागीय निर्देशों के अनुसार तो वे ऐसा कर ही नही सकते थे। इस दुनिया में जो मना किया जाता है उसे करने का तो आनंद भी वखरा ही होता है। बिगाड़ लो क्या बिगाड़ोगे? सूचना के अधिकार के तहत आर टी आइ लगाने वाले भी सूचना मांग चुके थे इन कोचिंग सेंटर्स की। कार्यकर्ता को पता चला इनका कही कोई लेखा जोखा ही नहीं। मगर चल रहे हैं। दौड़ रहे हैं। अपना सिट्टा सेंक रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारी की कोचिंग लेते अध्यापकी हाथ लग गयी। विद्यालय में भी जब देखो पुस्तक या गाइड हाथ में। अब ये बात अलग है कि बच्चों की पढाई से उन पुस्तको का कोई लेना देना नहीं।शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान भी ऐसा वर्ग अलग कमरे में बैठा रहता। प्रशिक्षण प्रभारी कहते उनके बचाव में । इनका प्रशासनिक सेवा परीक्षा का आवेदन किया हुआ है। मानो वह भी कोई अलग से योग्यता हो। दूसरे तीसरे या किसी न किसी प्रयास में सफलता हाथ लग ही जाती तो फिर जो पढाई नौकरी का खर्च हुआ। उसे वसूलने की तयारी शुरू हो जाती। एक जगह विशेष या सीट विशेष या दफ्तर विशेष के लिए विशेष प्रयास होते। दो चार साल में बदली ट्रान्सफर होते तो साल दो साल बाद फिर से वहीं का जुगाड़ हो जाता किसी न किसी दम पर। ज़मीन वाले डिपार्टमेंट में आए तो कोई भी सम्बन्धी बिना प्लाट भूखण्ड के न रहा। खुद सीधे न ले सकते थे तो साथ पढ़ने कोचिंग करने वाले के नाम पर लिए। फिर रीसेल में खुद के नाम करवा लिए। ईमानदार भी बने रहे। समाचारपत्रों में पैसे लेते पकडे जाने की बाते आमतौर पर छपती रहती थी। उसे खुद के खिलाडी होने का पूरा विश्वास था। सोचता था बेवक़ूफ़ हैं पकडे जाते हैं। आज सोच रहा था। अभी तक जो कमाए थे कम नहीं थे पर और और के फेर में आज चपेट पे आ गए। अधिकारी घूस लेते पकड़ा गया।©

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