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सोमवार, 29 दिसंबर 2014

चारपाई की निवार ढीली होकर उसे झूला बना रही थी। कई दिन के धुंध- कोहरे के आतंक के बाद सुनहरी धूप सिकुड़े शरीर को जो गर्माहट दे रही थी सो ज़िन्दगी जैसे भली लग रही थी। कस्बे में जुगाड़ करके एफ़एम् स्टेशन चला ही लेता हूँ। लोगों को शक होता है कि यहाँ एफ़एम् स्टेशन पकड़ सकता है। जुगाड़ी हो तो जुगाड़ हो ही जाता है। कोना ढूँढना पड़ता है घर का हो या छत का। हां । ऐन्टेना को गाड़ी के गियर की तरह ट्रीट करना पड़ता है। फिर ट्यूनिंग नॉब से रेड लगाओ या बिग, माय लगाओ या मिर्ची। देश के सीमान्त इलाके होने के कारण नज़दीकी देश के एफ़ एम् और टीवी स्टेशन भी पकड़ लेता है तो वहां के नशरीयात से वहां कौन कौन सी कंपनी कितने में कितने एम बी फ्री दे रही है। कौन से उम्मीदवार बार संघ के इन्तेख़ाबात में अपनी किस्मत आज़म रहे हैँ। चश्मे के लिए किस डॉक्टर को आँखे दिखाएँ। बेटी कुर्सी पर बैठी है। बेटा पत्नी और मैं झूला हो गए निवार की चारपाई पर अधबैठे अधलेटे से पता नही कैसे बैठे हैं पर हैं सुकून में। बच्चों ने स्थानीय स्कूल में संपन्न हुई शतरंज प्रतियोगिता में संतोषप्रद प्रदर्शन किया है। आराम की स्थिति शरीर की नही मन की होती है। आप गडमड बैठे हुए भी सुकून महसूस कर सकते हैं यदि मन शांत हो। मन में उहापोह और उठापटक हो तो तमाम भौतिक सुख भी शांति कहाँ देते हैं सो झूले में भी सुकून में थे। फिर भी किसी की हरकत कहाँ से कहाँ ले जाती है। चलते एफ़एम के कार्यक्रम में ध्यान था। कुछ उस छिपकली की तरह जो कई दिन की धुंध और ठण्ड के बाद अपने छिपने की जगह से बाहर आकर धूप से कुछ गर्म हो आई दीवार पर बिना हिले डुले चिपकी थी और अपने हाथ पैर सक्रिय करने की कोशिशों में लगी थी। वैसा ही आँख मीचे उनींदा मैं था और अपने कमर दर्द पर मानसिक विजय प्राप्त करने की कोशिशों में था।  बचकानी हरकते न करें बच्चे तो वे बच्चे कहाँ? और बेटा तो शुरू से ही चुलबुला है कि मसखरी करने वाले कह देते हैं उसकी मम्मी को ये टिक के बैठना सीखा नहीं है। पता नहीं पेट में कैसे रह लिया। मेरे सर पर हाथ फिराता..पापा आप तो गंजे होने वाले हो। क्या हुआ दुनिया में बहुत से गंजे हैं। मैं भी उनके क्लब में शामिल हो जाऊंगा। दीदी ! पापा के दांत देखो कह कर मेरा मुंह ज़बरदस्ती अपनी उंगलियों से खोल कर तरह तरह के मुँह बनाता रहा और भाई बहन हँसते रहे। उनकी मम्मी निरपेक्ष भाव से आँख मींचे चारपाई के परले सिरे की तरफ सर किये झूला हो गयी निवार पर गडमड मुड़ी सी लेटी थी। मुझे मेरे विचार एक सितम्बर दो हज़ार चौदह के उस मनहूस दिन में ले गए थे। पंडित पापा के अंतिम संस्कार के लिए क्रिया करवा रहा था और पापा के पार्थिव हो गए शरीर में विभिन्न कर्मकांड करवाता बोला । "अब मुंह में तुलसी चांदी सोने के टुकड़े इत्यादि डालो।" मैं लरज़ते हाथो और कंपकंपाती उँगलियों से पार्थिव देह का मुँह खोलने की कोशिश कर रहा था और पापा के अभी तक सलामत अनार के दानों से दांतों को देख रहा था। हतप्रभ था©

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