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सोमवार, 6 सितंबर 2010

अनजानी राहें

घर से निकलते है
तो  होता नहीं  पता
कहाँ जाना पड़ सकता है
१७ अगस्त १० की है बात
घर से निकला
रावतसर नगर पालिका
चुनाव को
कागज़ पत्र ई वी एम्
ले ली थी
इंतजार में था
पोलिंग पार्टी के
रवाना होने की
राजीव का आता है
सन्देश
मनोज गिर गया है
मोटर साईकिल से
भर्ती है
डबली अस्पताल में
शरीर पसीज गया है
जड़ हो गया है
क्या स्थिति  है
कोई अनुमान नहीं
चुनाव ड्यूटी कटवाना
प्राथमिकता है
प्रशासन  के कार्मिक
करते हैं सहयोग
टाउन पहुंचता हूँ
जहाँ हो चुका था
सी टी स्कैन
रिपोर्ट दिखलाते हैं
डाक्टर निशांत बत्रा को
देते है राय न्यूरो सर्जन
को दिखलाने को
पहुँचते है श्रीगंगानगर
डाक्टर महेश महेश्वरी
बोलते है
डाक्टर मामा को
फोन पर
''होल्ड'' करना होगा
डाक्टर महेश्वरी
शुरू करते है उपचार
सिख तड ''नर्से''
बींधती है नसे
चाह कर भी नहीं
कह सकते हैं
कुछ कडवा
क्योंकि हम कौन हैं
घर से निकलते है

तो होता नहीं पता
कहाँ जाना पड़ सकता है !
कहाँ जाना पड़ सकता है !!










1 टिप्पणी:

Amrita Tanmay ने कहा…

सही कहा ....... सच कोई नहीं जानता कि घर से निकलने के बाद मंजिल कहाँ होगा ? अच्छी पोस्ट ...........