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सोमवार, 30 अगस्त 2010

ईंट

ईंट
शायद ये कविता न हो
क्योंकि इसमें ईंट है
वाहक ट्राली से गिरी ईंट
अपनी साथी ईंटों से बिछुड़ी
सड़क पर पड़ी
शायद किसी कच्ची बस्ती में गिरती
तो कोई उठा ले जाता
पर ये तो  पौश कालोनी
कही जाती है न
ईंट उठाना तौहीन हो जाती
अगर उठा लेता
तो वह भी
हो जाती धन्य
किसी दीवार में लग कर
अपने संगी साथी के साथ
 बन जाती
किसी के 
आसरे का हिस्सा  
पर किसी ने
ना उठाया
दो दिन तक पड़ी रही
राह चलते
वाहन चूरा-चूरा
कर गए
किसी हाथ की
थापने की
पकाने की
सब मेहनत
व्यर्थ कर गए
मिट्टी  को
मिट्टी कर गए

1 टिप्पणी:

Amrita Tanmay ने कहा…

ईंट का भी दर्द इसतरह बयां हो सकता है ...........कुछ दर्द का अनुभव भी हुआ . अच्छी रचना .