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शुक्रवार, 11 जून 2010

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विज्ञापन  जगत
विज्ञापन जगत से मेरा  परिचय १९९७ में हुआ जब राजस्थान पत्रिका में इस बारे एक लेख आया और मैंने उस के प्रति उत्तर में कुछ लिखा| क्रिएटिव  डायरेक्टर्स क्लब की ओर से किरण खलप का पत्र मिला | जिसमे लिखा था ' हम आपकी सोच,समझ और लेखन प्रतिभा जानने के लिए एक छोटा सा इम्तिहान भेज रहे हैं ताकि आपके साथ पूरा न्याय कर सकें| ' फिर प्रश्नावली के जवाब में किरण का ही एक और पत्र आया जिसमे २७-९-९७ को झालाना संस्थानिक क्षेत्र स्थित राजस्थान पत्रिका के कार्यालय में उपस्थित होने को लिखा था|
अपने उस दिन के अनुभव को आज पेपर से पेपरलेस माध्यम में डाल रहा हूँ |

'विज्ञापन और प्रचार का युग है आज |टी. वी.,  रेडियो, समाचार पत्र-पत्रिका  में विज्ञापन देख, सुन और पढ़ कर प्रभावित ज़रूर होते हैं हम| क्रिएटिव डायरेक्टर्स क्लब ने क्लैरियन एड एजेंसी के मार्फ़त आवेदन चाहे थे| २३ सितम्बर को जब ऑफिस से घर आया तो टी. वी. पर क्लब की ओर से आया एक पत्र रखा था| २५ की शाम को ट्रेन से रवाना हुआ| २७ को अशोक मामाजी का स्कूटर ले कर पत्रिका कार्यालय पहुंचा |दस -पंद्रह के करीब लोग बाहर ही नज़र आ रहे थे| अन्दर जाकर पता किया तो वहां दो महिलाएं थी | मै ख़ाली कुर्सियों में से एक पर बैठ गया तो महिला मुखातिब हुई और पूछा इंटरव्यू के लिए आये हो? क्या अभी कहीं काम कर रहे हो?[अर्थ किसी एड एजेंसी आदि से था] साढ़े दस तक हम १८ लोग हाल में आ चुके थे|  क्रिएटिव डायरेक्टर्स क्लब की ओर से जयकृत  रावत, सुमीत और एक सज्जन और थे ने, परिचय के साथ व्याख्यान देना शुरू किया |सबसे पहला तथ्य हमारा आत्मविश्वास बढाने  के लिए कहा गया कि आप लोगों को १७०० लोगो में से चुना गया है | फिर कहा, आप में से कुछ लोगों को चुन कर मुंबई बुलाया जायेगा | पांच-छः हज़ार पारिश्रमिक  होगा | बाकी आपके परिश्रम पर निर्भर करेगा| हमारे पांच समूह बनाये | हर समूह को ट्रकों पर लिखे गए आम स्लोगन पर लगभग एक मिनट की स्किट बनाने को कहा| तैयारी  के लिए दस मिनट का समय दिया |mera ग्रुप नम्बर एक था और हमें 'जीयो और जीने दो' का नारा मिला|  हमारी थीम में शराबी ट्रक चालक के कारण राहगीर की जान चली जाती है| अंत में स्किट शराब पीकर कोई भी गाडी न चलने और जीयो-जीने दो के सन्देश औए मेरी लिखी चार पंक्तियों के साथ समाप्त हो जाती है|इस के बाद हमें व्यक्तिगत रूप से हाल करने को एक प्रश्न माला दी गई| पहला प्रश्न अंग्रेजी के एक प्रोवर्ब ए स्टिच इन  टाइम  ....की पुनर्रचना [अनुवाद नहीं] करनी थी , का  उत्तर मैंने 'जो समय पर ना चेते , वो बाद पछताए भुगते' लिखा| दूसरा  प्रश्न प्रधानमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार दूर करने सम्बन्धी  ३ नारे  लिखने बारे था | 'भारत माँ की यह पुकार ,जाये भ्रष्टाचार , आये सदाचार'  व दो अन्य लिखे | तीन में से तर्क सहित एक को रिकमेंड करना था |इसी को किया | तीसरा प्रश्न केलोग्स कम्पनी द्वारा दुपहिया वाहन धारी परिवारों में अपने उत्पाद को प्रचारित करने में आने वाली अड़चन के बारे में था |इसी प्रश्न का दूसरा भाग केलोग्स के लिए विज्ञापन बनाने का था | मेरा विज्ञापन था कि बच्चे अपनी माँ को  सुबह होने वाली देरी के बारे में कहते हैं| माँ- तब तो पूरी फिल्म देख कर सोयेंगे| पिता- ये लो केलोग्स पकाओ और खिलाओ ,पौष्टिकता भी परांठे मक्खन जितनी| बच्चे- [ख़ुशी से चिल्लाते हैं] 'केलोग्स-केलोग्स ,नहीं निकलेगी स्कूल बस |' चौथा प्रश्न कोडक मेमोरीज़ था | इसमें तीन अलग-अलग मीडीयम  के लिए विज्ञापन बनाने थे |पहला निन्नी की मम्मी- हाय निन्नी के ये लहंगा -चुन्नी का सूट कितना सुन्दर लग रहा है|
निन्नी  - लेकिन यह तो अगले साल छोटा हो जायेगा|फिर मुझे यह सूट कैसे याद रहेगा?
तभी निन्नी के पापा 'क्लिक' करते है |निन्नी का फोटो आता है| अब यह सूट मुझे हमेशा याद रहेगा| कोडक से |दूसरा रेडियो के लिए लिखा और तीसरा उदयपुर के कुछ दृश्य स्केच किये और ऊपर और नीचे सिर्फ कोडक लिखा और 'उदयपुर का भ्रमण आज भी याद है' कैप्शन दिया| प्रश्नावली हल करके सुमीत को पकड़ाई| उन्होंने मुझे कहा की दो बजे शॉर्ट  लिस्ट करेंगे तब तक आप घूमने जा सकते हैं| रवि से मिलने दुर्लभ जी हॉस्पिटल गया ,पता चला वह बाहर गया हुआ है|  फिर बी -३ पहुंचा | डॉ. नरपत सिंह शेखावत से कुछ देर बात  की| वे  लालू  का रूटीन चेक अप करने आए थे| लगभग दो बजे मैं फिर पत्रिका कार्यालय में था| मीटिंग जरी थी | तीनो बारी-बारी से  कुछ बता रहे थे कि दो चार लोगों को छोड़कर यदि कापी में नाम बदल कर आपको वापस दे दी जाये तो आप को कोई अंतर नज़र नहीं आएगा | अब मै इंटरव्यू  के लिए कुछ नाम बोल रहा हूँ... और  सबसे पहले मेरा नाम बोला तो सुखद आश्चर्य हुआ| मेरे बाद सिर्फ तीन नाम और बोले| तत्काल बाद ही इंटरव्यू लिया | वर्त्तमान में क्या कर रहे हो? कितने पैसे मिलते हैं? मुंबई में रह सकते हो?   क्या सोच कर अप्लाई  किया था ? मैंने वर्तमान काम छोड़ने में असमर्थता जताई और पत्राचार से स्क्रिप्ट वगैरह भेजने का प्रस्ताव किया | लेकिन उन्होंने टीम वर्क में मौजूद रहने की कार्य की ज़रूरत बताई| उन्होंने फिर कहा कि हम आपको खोना नहीं चाहते| यदि दिल्ली रह सकते हो तो भी कोशिश कर सकते हैं| लेकिन मैंने दिल्ली के लिए भी असहमति जताई तो  सुमीत बोले ''देन वी विल नॉट वेस्ट योर टाइम | मै थैंक  यू कह कर उठने लगा तो तीनो ने हाथ मिलाया | सुमीत तो अपनी सीट छोड़ कर मेरे साथ बात करते हुए  कमरे के बाहर तक आए |मै उसी रात को जयपुर से रवाना हुआ |

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