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सोमवार, 7 जून 2010

UDAIPUR ME GYARAH DIN

उदयपुर  में ग्यारह दिन
राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान उदयपुर की ओर से ऑफिस  में जब पांच शिक्षकों  की प्रतिनियुक्ति के बारे में पत्र पहुँचा  तो सोचा नहीं था कि मै भी उन पांच सौभाग्यशाली शिक्षकों में रहूँगा| एक जून को जो अंतिम आदेश मुझे मिला [और यह आनंद जी के विशेष प्रयासों से मिला] में मेरे और आनंद जी के अलावा नरेन्द्र, राजकुमार और सोहन यादव के नाम थे |
२ जून १९९६
पहले आज शाम को जयपुर एक्सप्रेस से जाने का कार्यक्रम तय था परन्तु मैंने और नरेन्द्र ने आपसी विचार -विमर्श करके सुबह चंडीगढ़ एक्सप्रेस से जाने का निश्चय किया| राज कुमार को तो फ़ोन पर बदले हुए कार्यक्रम की सूचना दे दी पर आनंद जी के इंतजार में हम थे |आनंद जी ने २ जून की रात हनुमानगढ़ में ही व्यतीत की |
३ जून १९९६
आज मनोज भाई का जन्म दिन है पर हमें सारा दिन सफ़र में रहना था |प्रातः समयानुसार तैयार होकर भी थोड़ी भाग दौड़ गाडी पकड़ने के  लिए करनी पड़ी क्योंकि गाडी बिलकुल सही वक़्त पर थी| हनुमानगढ़ से टू टीयर डिब्बे में बैठ गए |राजकुमार की भाभी ,उनका भाई और लेक्चरेर  भुल्लर भी बीकानेर तक हमारे साथ थे |थोड़ी चुहलबाजी शुरू ही की थी कि टी टी इ आ गया | उसने हमें या तो रिजर्वेशन चार्जेस देने को कहा या अगले स्टेशन पर डिब्बा बदलने को कहा| लूणकरणसर में हमने यह किया| गाडी जब बीकानेर पहुंची तो हम चारों [सोहन के सिवा] ने रोटी सब्जी वाला अपना अपना डिब्बा खोल लिया| दोपहर काफी गरम थी |दूर तक टिब्बे ही टिब्बे और रेत फैली नज़र आ रही थी |बीकानेर से चढ़े  कुछ यात्रियों ने  राजनीति पर चर्चा शुरू कि तो वह उस गर्मी में किसी को सुहा नहीं रही थी |इसलिए वह निरर्थक चर्चा अधिक देर तक नहीं टिकी |करीब ढाई बजे गाडी मेड़ता  रोड पहुंची तो वहां हमें उतरना था |चाय पीना चाहते थे लेकिन स्टाल वाले से रेल बस के बारे में जाना तो उसने बताया कि अलग प्लेट फार्म से वह जाने को तैयार  है|नरेन्द्र को टिकेट लाने भेजा |मेड़ता रोड से मेड़ता सिटी तक का भी रेल बस से सफ़र पहला और अनूठा था| इसके दोनों ओर ड्राइविंग  सीट लगी है |मेड़ता सिटी उतरने के बाद स्टेशन के पास ही एक ढाबे पर चाय पी| इस से पहले संयुक्त खर्च के लिए मुझे तीनो ने २०० रुपये कि दर से ६०० रुपये दिए |टहलते हुए पास स्थित बस अड्डे तक पहुंचे और पुष्कर के लिए बस का पता किया| पौने पांच बजे की बस मिली |पुष्कर तक का प्रति व्यक्ति १७ रुपये किराया लगा  |लगभग छः बजे हम पुष्कर में थे |नज़दीक ही महेश्वरी धर्मशाला पहुंचे |वहां का लड़का आनाकानी कर रहा था |नरेन्द्र ने अपना चातुर्य दिखाया  और पंडित जी बन कर उसे कमरा देने को राजी कर लिया |१५ रु धर्मशाला वाले को देने थे |मुक्त हो कर, तरो  ताज़ा होकर चाय पीने पहुंचे | राजकुमार का कैमरा हमारे  साथ था |घाटों की ओर गए | वहां सिल्ट निकालने का कार्य चल रहा था |पानी कम था फिर भी हम नहाये |आधे घंटे बाद ब्रह्मा जी के मंदिर गए | दो बार पहले भी पुष्कर आया हूँ पर  इस बार पहले जैसी भीड़ नहीं है|इस लिए आराम से दर्शन किये |वापसी के समय कुछ खरीददारी करने की इच्छा थी पर मै सीधे ही राजकुमार के साथ धर्मशाला पहुंचा |काफी प्रतीक्षा के बाद नरेन्द्र और आनंद जी आये | वे उस समय टेलीफ़ोन करने में व्यस्त थे और हम अजमेर जल्दी पहुँचने की जल्दी में उनका इंतज़ार कर रहे थे |खैर उनके आने के बाद बस स्टैंड पहुँचने के कुछ देर बाद ही एक प्राइवेट कोच अजमेर तक के लिए मिली |आगरा गेट के पास उतर कर तांगे से अजमेर बस अड्डे पहुंचे |बस अड्डे पर बस की प्रतीक्षा कर रहे थे |एक बस थी पर वह लम्बे रूट से जाने वाली थी |एक बार ट्रेन से जाने का कार्यक्रम बनाया और रेलवे स्टशन तक आये |ऑटो रिक्शा किया |चालक ने उदयपुर के लिए विडिओ कोच के बारे में बताया तो उसे रुकवा कर  एजेंसी   वाले से बात की |७० रु प्रति व्यक्ति किराया ,१०-३० आना और सुबह ०५-३० पर उदयपुर  पहुँचाने के बारे बताया तो हमने ऑटो वाले को विदा किया और चार सीट बुक करवा दी |१०-४५ पर बस आई तब तक हमने साथ लायी हुई पूडिया पास ही एक चाय वाले के यहाँ खायी |प्रत्येक कार्य  सहज भाव से करने का आनंद था |किसी भी तरह की खीझ  अब मन में नहीं थी | ब्यावर  में रुकने से पहले अजमेर से ११ बजे रवाना  हुए |
४ जून १९९६
नाथद्वारा पहुँचने पर थोडा सा उजास दिखाई देने लगा था |उसके बाद तो मार्बल उद्योग किस कदर वहां फैला है का आभास चलती बस से ही होने लगा था | हीरो होंडा कंपनी का लगाया बोर्ड 'उदयपुर में आपका स्वागत' देखा तो लगा कि  उदयपुर करीब ही है| कोच ड्राईवर बहुत रैश ड्राइविंग  कर रहा था |किसी भी मोड़ पर वह जब लगभग उसी गति में घुमाता तो बेचैनी होने लगती और भगवान् भी याद आने लगता| लेकिन चाहते हुए भी मैंने नहीं कहा कि 'कृपया धीरे चलायें'| क्योंकि हम पहली बार जा रहे है, इनका तो रोज़ का ही काम होगा | करीब साडे छः बजे हम बस अड्डे के निकट उतरे| बाद में पता चला कि जहाँ हमें जाना था यानी देवाली, के निकट से हम गुज़रे थे| वहीँ अड्डे पर चाय पी, अखबार लिए, और बीस रु में ऑटो वाले को तय कर S I E R टी होस्टल पहुंचे| वहां नहाने के लिए निकले तो देखा कि पंचायत समिति सूरतगढ़ से भी चार अध्यापक और एक S D I पहुंचे थे जिसे बाद में रिलीव कर दिया |ग्यारह बजे सभी ऊपर हाल में रजिसट्रेशन  की   कार्यवाही के लिए एकत्रित हुए| इससे पहले सहायक निदेशक दीपक जोशी का व्याख्यान हुआ| शाम को फतेहसागर की ओर सोहन के साथ घूमने को गया|
५ जून 1996
आज सुबह नाश्ता मिला| इसके बाद नौ  बजे से कक्षा शुरू हुई| दोपहर का भोजन  ब्रेक के बाद दो बजे से फिर क्लास लगी | शाम को चाय के बाद सिर्फ फतेहसागर झील के किनारे जाने के आलावा ज्यादा समय बचा नहीं था | हां इससे पहले सोलर ओब्ज़र वेटरी जा आए  थे|
६ जून १९९६
सुबह जल्दी उठ कर मै पांच बजे तैयार हो गया| रात को हम सभी ने पास की पहाड़ी पर नीमच माता के मंदिर जाने का निश्चय किया था| सभी को उठाने और कह- कह कर नहलवाने में ६-१५ हो गए| धूप काफी हो गयी थी फिर भी मंदिर गए| ऊपर जाते समय सांस चढ़ गया पर सिवाय राजकुमार के हम बिना रुके ही मंदिर पहुंचे |आनंद जी ने पता किया कि वहां के पुजारी मीणा जाती से है |उदयपुर को उस ऊँचाई से देखना अनूठा अनुभव रहा| अरावली की छितरी हुई पहाडियों ,फतेहसागर झील,हरियाली के बीच दीखते मकान व अन्य भवनों में वास्तव में गौरव आन्वित लोग रहते होंगे, ऐसा महसूस हुआ | लगभग एक घंटे बाद वापस आए  तो फिर से नहाने की इच्छा थी पर वहां पहली बार नहाने वालो की ही बारी चल रही थी| दिन में भैरूं जी कुम्हार ने चाक घुमाना सिखाया और मिट्टी के खिलौने बनाने  के भी कुछ गुर दिए| भैरूं जी राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित कलाकार हैं | विशिष्ट प्रकार के दीप बनाना इनकी मुख्य कला है| शाम को फतेहसागर की ओर ,जिससे हमारी जान पहचान काफी बढ गयी थी,चल पड़े |पैडल बोट  उसकी छाती पर तैरती नज़र आ रही थी| तत्काल ही हमने भी उसके और नज़दीक हो जाने का निश्चय   किया |आधे घंटे का किराया ४० रु था | पैडलिंग करते-करते पसीने -पसीने तो हो गया पर इस श्रम का अपना अलग आनंद था| फिर सोहन के साथ ऑटो से चेटक सर्किल गया| कुछ सामान ख़रीदा सोहन पेट की खराबी से परेशान था इस लिए दवा  ली.  |लगभग नौ बजे देवाली होस्टल पहुंचे| बीयर  का कुछ भी असर नहीं हुआ|  खाने के बाद स्नान किया और कुछ सैर को गए |
७ जून १९९६
सुबह की सैर और चाय से वापस आकर रूटीन कार्य के अनुसार क्राफ्ट क्लास में बंधेज कार्य सिराजुद्दीन जी ने सिखाया |लगभग पौने तीन बजे सी सी आर टी  की ओर से हमें दो बसों में भ्रमण के लिए ले जाया गया|सबसे पहले भारतीय लोक कला मंडल आये | यहाँ भारत की लोक संस्कृति विशेष कर आदिवासियों  की लोक संस्कृति से जुडी वस्तुओं , वस्त्रों, वाद्य यंत्रो, गहनों का संग्रह है| काफी कुछ नोट करने की भी कोशिश की |बस यहाँ से सहेलियों की बाड़ी पहुंची |फव्वारों और हरियाली से भरा यह बाग़ देखने के बाद मोती मगरी की ओर चले| बाड़ी में स्थित संग्रहालय को देक्न्ने का समय कुछ देर पहले ख़त्म हो जाने से उसे देख सके | लेकिन सी सी आर टी की ओर से दिए गए प्रशन पत्र में संग्रहालय से सम्बंधित कुछ प्रश्न  थे |इसलिए राजकीय कार्य पूर्ण करने की परंपरा को किसी भी तरह निभाने का गुर अनजाने में ही हमारे साथ गए प्रशिक्षकों और बाबुओं ने सिखा दिया |गाइड से उन दो चार प्रश्नों के उत्तर पूछ कर सबने प्रश्नावली भर दी |हां, तो मोती मगरी में राणा प्रताप का स्मारक देखा| वहां लिखी इबारत और उनके बारें में लिखा विवरण पढ़ा |कुछ फोटो ग्राफी की| राजकुमार का कैमरा जिंदाबाद| हक़ीम खां सूर की प्रतिमा के नीचे बैठकर पांचो की एक साथ फोटो करने के लिए वही घूम रहे  एक व्यक्ति को कैमरा थमाया तो कैमरा जवाब दे गया ,फ्लेश लाईट भी मंद पद गयी और बटन दबाने पर किर्र-किर्र  की आवाज़ आने लगी | हॉस्टल सवा सात बजे आये |भोजन के पश्चात दिया गया लिखित कार्य पूरा किया|

८ जून १९९६
दिन भर आज काफी शिक्षण  प्रशिक्षण हुआ |ऋषि ने जल और हस्त कला उद्योग को संरक्षण विषय पर लेक्चर दिया| १०-३० की चाय के बाद डॉ युगल किशोर ने रंगोली बनाना बताया |शाम के सत्र में एजूकेशनल टूअर्स के बारें में योजना बनाने के सहायक बिन्दुओ पर चर्चा की गयी |सत्र-समाप्ति के बाद पाँचों सैर को निकले |टेम्पो   से दिल्ली गेट आये |यहाँ एक खिलौने वाले की दूकान में घुस गए और सभी ने जल्दबाजी में अधिक खरीद दारी की |ज्यादा नहीं तो कुछ नुक्सान अवश्य उठाया| यहाँ घूमते -फिरते स्टूडियो की तलाश में थे |कुछ दूर लक्ष्मी कलर लैब नज़र आयी| भीतर गए, कैमरा टटोल कर काउंटर पर बैठा व्यक्ति बोला , फिल्म ख़त्म हो गयी |जब उससे कहा की १० स्नैप  और हो सकते थे तो वह बोला पांच-छः से ज्यादा स्नैप नहीं आये हैं तो समझ गया की ज्यादा जानकार नहीं है पर मजबूरी थी| उसने साढ़े आठ बजे डेवलपिंग और प्रिंट ले जाने को कहा| हमारे पास करीब एक घंटा था| एक और फिल्म डलवाई और समय गुज़ारने के इरादे से चल पड़े| आनंद जी ने वहां से अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदे| पास ही नगर पालिका का बाग़ था| वहां स्थित मोहन लाल सुखाड़िया रंग मंच के बहार की ओर नगाड़ों और शहनाई की मोहक धुन ने हमें आकर्षित किया | हम भीतर की ओर बढ़ चले | गेट पर पता किया तो बताया गया कि किसी सरस्वती नृत्य विद्यालय की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन था | प्रवेश के बारे में पास होना आवश्यक बताया |जब हमने उन्हें 'बाहर' से आना बताया तो उन्होंने हमें 'भीतर' जाने दिया| संभवतः टिकट की व्यवस्था वहां नहीं थी |मंच सञ्चालन आकाशवाणी जोधपुर के कोई उद्घोषक कर रहे थे |सरस्वती वंदना के बाद बालिकाओं ने गोरबंद  का जो समां बांधा कि लय, ताल से सभी सम्मोहित हो गए| महाराष्ट्र का लावणी नृत्य इसके बाद प्रस्तुत किया जा रहा था | समय ८-३५ से ऊपर हो चला था |बाहर निकलते ही  आनंद, नरेन्द्र और राजू अलग हो गए | मैं और सोहन कलर लैब की ओर गए  |फोटो लिए ,जूस पीया और देवाली को चले |हॉस्टल से पहले की कुछ दूकानों पर तीनों साथी मिल गए|
९ जून १९९६
सबेरे भैरूं सिंह पडिहार ने बांस क्राफ्ट के बारे में जानकारी दी| कल शाम को कार्यक्रम के बारे में जो जानकारी दी गयी थी उसके अनुसार ही दोपहर बाद  हमें १२-३० पर फ्री कर दिया गया था| दोपहर का भोजन कर विश्राम किया| हलकी सी झपकी आई| सूरतगढ़ से आये एक अध्यापक साथी ने आकर सबकी  तन्द्रा भंग की|तब तक २ बज चुक थे| हम में से सोहन ने संपर्क साधा और नाथद्वारा जाने को एक ग्रुप तैयार था| हम पाँचों के साथ अजमेर से आई रश्मि, राजकुमारी,राधा और मोहाली से आई चंद्रकांता थीं| हम नौ जन ने दो ऑटो रिक्शा किये और चेटक सर्किल pahunche | नाथद्वारा के लिए रोडवेज़ की बस तैयार ही थी| पौने चार हम नाथद्वारा बस अड्डे पर थे| वहां से ऑटो रिक्शा कर के मंदिर के मुख्य द्वार के निकट पहुंचे| अपेक्षा से कहीं अधिक भीड़ उस उमस और गर्मी में थी| भीड़ की धक्का मुक्की सहते हुए ''श्री नाथ जी'' के दर्शन किये| बाहर निकलने से पहले मीरा मंदिर की ओर भी गए| महिलाओं की खरीददारी किस तरह की होती है ,इसका अनुभव भी वहां हुआ जब देखा कि अजमेर वासिनी तिकड़ी आभूष्नो की दूकान में घुस तो गयी परन्तु पौने घंटे तक देखने के बाद भी उन्हें कुछ पसंद नहीं आया| बाहर की ओर निकलते समय ठेले वाले को भाँग घोटते देखा तो सेवन की इच्छा हो आई| तैयार करवाई ,राजू ,सोहन और मैंने एक-एक गिलास लिया| आनंद और नरेन्द्र ने कुल्फी ली| बस अड्डे की ओर पैदल ही चले | हलकी सी राह भटके , जल्दी ही पूछ कर अड्डे आए|वहां सबने गन्ने का जूस पिया| थोड़ी देर बाद बस रवाना हुई और महिला सदस्यों के किस्से सुनाता-सुनाता सोहन बहक गया| जोर से बोलने, बहकने ,रोने और महिला सदस्यों को डराने जैसे सभी कौतुक उसने कर दिए| घबरायी महिलायें आगे की सीटो पर जाकर बैठ गयी|सोहन के साथ बराबर बोल रही चंद्रकांता को मैंने चुप रहने का संकेत किया| फतेहपुर चौराहे पर हम उतरे| सोहन,राजू,नरेन्द्र और मैं पैदल ही होस्टल पहुंचे| मैस में भी जहाँ-तहां   सोहन उलझ रहा था| उसे साथ वालों से अलग कर के कमरे में जाकर सोने को कहा पर वह देरी से आया|मैंने मुझ पर भाँग का कोई असर न देखा तो खूब मीठा डालकर चावल खाए| फिर नहाने पर कुछ रंग चढ़ा|

१० जून १९९६
रात खूब गहरी  नींद आई पर सुबह उठने पर शरीर में भारीपन था|फिर भी ढाबे पर सोहन के साथ जाकर चाय पीकर आया| वापसी के बाद नहा -धो कर क्लास अटेंड की| आज सभी से अपने-अपने जिलों के संसाधन ,संस्कृति के बारे में लिखने  को कहा गया| दोपहर बाद भोजन पश्चात क्लास अटेंड करने की इच्छा तो थी पर शरीर बोझिल था इस लिए कमरे में ही सोता रहा| मेरी अनुपस्थिति में प्रेम भंडारी ने 'मेघा आओ रे' सुनाया तो सचमुच मेघ आ गए और संभवतः गीत से प्रसन्न होकर पानी की बौछार कर दी| आनंद जी  जी वगैरह आये और मौसम के खुशगवार होने की सूचना दी| चाय पीकर क्लास में गए तो हमें ग्रुप वाइज़ प्रोजेक्ट वर्क पर चर्चा करने को कहा गया| हम सीमा,सुजाता,हेमोलता,रामचंद्र ,क्रिशन,तारिक़,विजय,अमर सिंह ,दीपचंद और मै थे| प्रोजेक्ट पर चर्चा से पूर्व क्रिशन पारीक आवशयक्ता से ज्यादा मुखर था| मैंने देखा कि सभी सीमा को प्रभावित करने की कोशिश में थे | पारीक ने तो उसको ग्रुप लीडर घोषित कर दिया ,पर किसी ने इस पर आपत्ति भी नहीं की|जब सभी निरर्थक चर्चा में व्यस्त थे तो पूर्व में ही विषय बता दिए जाने पर मैंने कुछ प्रयास प्रोजेक्ट के बारे में किया था| वशिष्ठ के आने पर जब वे कागज़ दिए तो उन्होंने गौर से पढ़ा और और पूछा कि   ये किसने तैयार किया है? साथियों का मेरी ओर इशारा करने पर उन्होंने मुझ से पूछा , ''क्या आप म्यूजिक  टीचर हैं?'' उन्होंने थोड़ी सी बाते और जोड़ कर फेयर करने को कहा| इससे कुछ पहले सीमा एक स्थानीय शुभांगी को लेकर आई और मुझ से परिचय करते हुए बोली 'ये मेरी आंटी हैं' |मेरे कुछ बोलने से पहले ही उन्होंने नमस्ते कही| उन्होंने भी वे कागज़ देखे थे | आकृति के बारे में मेरा सुझाव सुजाता को भी पसंद आया| शेष लोग निष्क्रिय थे | पारीक वाचाल था पर बातचीत से लगा कि सीमा सुजाता वगैरह ने उसे डिस्कार्ड कर दिया है|मैंने अखबार काटा और सुजाता ने उसी के अनुसार चार्ट के रंगीन पन्ने| मौसम के खुशगवार हो जाने से अब किसी के लिए भी अन्दर बैठना मुमकिन नहीं था| गर्मी से रहत जो मिल गयी थी|
११ जून १९९६
प्रातः कालीन सत्र में हमें प्रोजेक्ट वर्क करने से रोक  दिया गया था|एम् पी शर्मा  व्याख्यान देने आ पहुंचे थे|शाम को रश्मि व  राजकुमारी [जो नाथद्वारा विजिट के दौरान बोटिंग के बारे में कह चुकी थी] फतेहसागर के किनारे घूम रही थी|मैंने फतेहसागर में तैराकी का आनंद लिया, जिसकी इच्छा पहले से ही थी|नहाने के बाद आगे वे हमें फिर मिल गयीं| उनके साथ डीजल चालित बोट में सवार होकर झील के बीच स्थित नेहरू गार्डन की ओर चले| काफी देर घूमने और और फोटो सेशन के बाद वापसी नाव द्वारा ही संभव थी| रश्मि ने ऑटो करने को कहा ,मैंने उत्तर दिया कोई ऑटो नहीं, इतना तेज़ चलो कि सबके पसीने आने चाहिए| बीच रास्ते में रश्मि बोली ''आप लोगों के साथ तो घूमना हमें याद ही रहेगा|'' आज रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम में राजस्थान का प्रतिनिधित्व होना निश्चित  था | राजू और  मैंने हनुमानगढ़ का प्रतिनिधित्व किया| राजू ने ''डोंट टच  माई...'' तथा मैंने ''तुम इतना जो...'' सुनाया| अपनी प्रस्तुति से मै संतुष्ट था |
१२ जून १९९६
आज सुबह हमें जल्दी तैयार रहने को कहा गया था| मेरी कल की प्रस्तुति की मेरी संतुष्टि  पर तारिक ने तारीफ और अमरजीत जलाल ने ''क्या आप गज़ले गाते रहते हो '' कह कर मोहर लगायी | तब करीब साढ़े आठ बजे थे और हम बसों के चलने  की प्रतीक्षा में थे | सीमा बिलकुल पीछे वाली सीट पर आकर बैठी और बस में चलाये जा रहे कैसेट के गीतों से अपनी राग मिला रही थी|सर्व प्रथम माणिक्य लाल वर्मा गार्डन पहुंचे|जहाँ करीब आधा घंटा रहे| इसके बढ का पड़ाव सिटी पैलस था|उमस से पसीने से तर बतर शरीर में भी जोश  था|सिटी पैलस के बाहर की दूकानों में से एक में बैठ कर शिकंजी पी| पैलस के भीतरी भाग  की देख भाल मेवाड़ ट्रस्ट करता  है|  इसीलिए इसकी सुन्दरता बरकरार है|अन्य महल किलों की तरह वहां पर्यटकों के अनधिकृत लिखे खुदे नाम नज़र नहीं आये| इसके बाद जगदीश मंदिर आये| वहां से जब बस की ओर गए तो पता लगाकि  जिस बस में हम आये थे वह निकल गयी थी|  दूसरे ग्रुप की बस में आये| मैस में खाना खाया थोडा सुसताए तो दो बज चुके थे | सायं कालीन ट्रिप में  आहड़ के स्पोट  museum पहुंचे|वहां के संग्रहालय में मिट्टी के पात्र व मूर्तिंयां अधिक  है| आहड़ से निकले तो वर्षा शुरू हो गयी| मूसलाधार बारिश| पर इसी बारिश में भीगते हुए पहुंचे शिल्पग्राम| बाहर बस में कुछ देर इंतज़ार किया पर वर्षा नहीं रुकी तो जूतियाँ बस में ही छोड़ कर पैदल ही शिल्पग्राम में घुस गया| अपने आप में अनूठी जगह है शिल्पग्राम| भोपे, कठपुतली वाले, भपंग बजाने वाले,तेरह ताल इत्यादि गाने -बजाने वालो के अपने अलग-अलग मंडप| जो गावों में बने झोंपड़ो जैसे ही बनाये गए हैं| शहर में भी अनूठा गाँव  जहाँ न केवल राजस्थान बल्कि गुजरात,महाराष्ट्र, ,गोवा आदि से सम्बंधित  संस्कृति भी प्रदर्शित की गयी है |यहाँ कलाकारों को दैनिक भुगतान के अधर पर बुलाया जाता है और निश्चित दिनों तक रखा जाता है |दर्शन मिठू को तो जोश आ गया और भोपों ने जो अब तक खुद गाने में मसरूफ थे ,वाद्य छेड़े और मिठू ने जो 'हाय ओ रब्बा ...' सुनाया तो बिहारी, मराठी साथी उछल कूद करने से नहीं चूके | वहां से भारतीय लोक कला मंडल आये| सटते ऑडीटोरीअम में एक घंटे का कार्यक्रम दिखाया जाता है| जिसमे पहले आधे घंटे कठपुतली नृत्य और बाद में घूमर , तेरह ताल और भवाई नृत्य  दिखलाये गए| मेरे दायीं  ओर एक विदेशी युगल था| उनसे मैंने बात की| वे इंगलैंड से थे| उसने मेरे बारे में भी पूछा , जब उसे बताया कि पूरे भारत के प्रदेशों से अध्यापक प्रशिक्षण में आये हैं तो उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया| ७-३० पर होस्टल पहुंचे| सीमा भी वहां पहुंची तो उसके ग्रुप लीडर होने के करण मैंने उसे छेड़ा कि  प्रोजेक्ट की चिंता है कि नहीं? खाना खा कर लेटा  ही था कि आनंद ने कहा कि रश्मि वगैरह नीमच मंदिर  जाना चाहती  हैं| थोड़ी ही देर में प्रोजेक्ट का सारा  सामान पारीक मुझे दे गया|रात पौने बारह बजे तक स्केच पैन चलता रहा|

१३ जून १९९६

सुबह चार बजे से पहले ही आँख खुल गयी| नहा -धो कर प्रोजेक्ट लेकर बैठा|साढ़े छः बजे सोहन के साथ चाय पीकर आया|वापसी के बाद फिर काम में जुट गया| तभी आनंद जी आये और उन्होंने मंदिर चलने को कहा| बाहर निकला तो रश्मि, राधा और हर्षा भट्ट  तैयार थीं| रश्मि को अपने मोटापे के  कारण चढ़ाई में दिक्कत आ रही थी |राधा और हर्षा बिना कठिनाई के चढ़ रही थीं| वापसी करीब आठ बजे हुई| फिर से पसीने -पसीने हो गया था| आज लगभग सारा दिन ही प्रोजेक्ट को समर्पित था | सिवाय सीमा और सुजाता के किसी भी सदस्य ने सक्रिय सहयोग नहीं किया| शाम तक अपनी ओर से काम पूरा करके सीमा को दिया जो कुछ कटिंग्स लगाने के लिए घर ले गयी|शाम को फतेहसागर कि ओर गया|
१४ जून १९९६

 सुबह के सत्र में सभी समूहों ने अपना प्रोजेक्ट प्रस्तुत किया|दोपहर बाद वर्क शॉप के बारे में अपने निजी अनुभव और और सुझाव लिखने को कहा गया \  अपने मुंह  मियां  मिठू वाली बात होगी पर नहीं लिखूंगा तो भूल जाऊंगा| मै अपने अनुभव लिख रहा था और सीमा और रश्मि मेरे लेख का इंतज़ार कर रही थी | मैंने लिख कर उन्हें दिया और मैस चला गया| जमा करवाने कि जिम्मेदारी सीमा को ही सौंप दी थी |खाना खाकर ऊपर वापस आए और टी ए बिल भरे| सभी ने राशी ली | एक-एक कर सब विदा होने लगे | हर्षा जाने लगी तो बोली ''अच्छा जाते हैं'' सुनकर मैं उन तक गया और अभिवादन किया तो उन्होंने फोटो के बारे में पूछा| मैंने कहा ज़रूर भेजूंगा| होस्टल मैस की ओर से सब को खाने का डिब्बा दिया जा रहा था| ४-१५ पर होस्टल छोड़ा| रेलवे स्टेशन पहुंचे| ६-१० [सही समय] पर गाडी ने उदयपुर स्टेशन छोड़ दिया|

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