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मंगलवार, 11 मई 2010

SAANIDHYA

सानिध्य
आसमान अटा
पहाड़ी और पेड़ों से
अनजान,अनगिन चेहरे
कुछ डरे,कुछ सहमे
कुछ अड़े से
एक चेहरा
तपा हुआ
सभी चेहरे उसके पीछे
ठंडी ! बर्फ से भी ठंडी
रेत, भाप लगती
धुआं सा पानी से उठता
लहरदार धुआं
रेत पर निशाँ
किसी रेंगने वाले कीड़े के
वाह !  कुदरती डिजाइन
फिर हंसी भरे बेफिक्र चेहरे
काफी कुछ हासिल किये
रात किसी तलाश में
सीमाहीन वार्ताएं
निकटता की चाह
शिकवा वक़्त से
दूर हो जाने की
सच्चाई जानते हुए
फिर भी अटका है मन
उस मंज़र में जहां
प्रकृति के सानिध्य में
पानी, पहाड़, पेड़,
पवन सब तो है
१५-११-९६
घाटगेट से जीप  द्वारा गोपाल  के साथ नई नाथ  पहुंचा   तो ९-१५ हो चुके थे | वही अड्डे पर चाय पीकर सीधे बलराम आश्रम आए| धर्म शाला की देखभाल करने वाला संभवतः हमारे बैग ,सूटकेस  वगैरह हाथ पीठ पर लदे देख कर हमारे 'संधान' से जुड़े होने का अनुमान लगा चुका था |   सो हमें वह सीधे ही गाइड करते हुए फर्स्ट फ्लोर के एक कमरे की ओर ले गया कुछ देर बाद लगभग सभी संभागी पहुँच  चुके थे| थोड़ी देर तक साथ वाले कमरे में बैठ कर चर्चा की  |सबने फिर से अपना-अपना परिचय देना शुरू किया | कुछ नए दोस्तों से मुलाकात हुई जो २९-३१ बैच स्क्रीनिंग में सफल हुए थे| इनमे धौलपुर से दो राजेंद्र और गजराज, बुजुर्ग सोनी, चांदमल, सुनीता,दलीप भाटी, अमित और धर्मेन्द्र थे| सभी लगभग दोपहर से पूर्व जांगिड धर्मशाला पहुंचे| जहाँ एन एस डी दिल्ली से थिएटर इन एजूकेशन  के निदेशक जनाब अब्दुल लतीफ़  और उनका कनिष्ठ साथी मनोज हम से पहले ही पहुँच कर हमारा इंतजार  कर रहे थे| घूमते -फिरते उनसे अनौपचारिक परिचय हुआ फिर शुरू हुआ छः दिन तक चलने वाली अनूठी और निजी जीवन की पहली नाट्य कार्यशाला |शुरुआत एक दूसरे की आँखों में झाँकने से हुई |सभी दोस्त एक दूसरे की आँखों में समा जाते हुए  कुछ क्षण के लिए रेंडम विचरण कर रहे थे| फिर सबने आँखें मूँद लीं| और उन चेहरों को याद के सहारे अपने सामने लाने  का प्रयास कर रहे थे| अब सभी हाथ मिला रहे हैं | नरम हाथ, पसीजे हाथ, कठोर, सामान्य , खुरदरे और सभी अपने में अलग-अलग हाथ| अब आँख बंद है और  वही रेंडम विचरण , पहचानने की कोशिश कर रहे हैं हाथों से | तभी लतीफ़ भाई का निर्देश होता है और सभी रेंडम विचरण में रत हैं | अचानक गति बढ़ जाती है |अब तो सभी दौड़ रहे हैं | अब स्पेस कम हो गया है| एक भीड़ का अहसास है | भीड़ में फंस गए हैं , कोई दायें, कोई बाएं ,जिसको जहाँ से जगह मिल रही है निकल रहा है| साँसे सुनाई पड़ रही हैं ,सभी हांफ रहे है| मुझे भी पसीना आ गया है ,धड़कन बढ़ रही है नहीं बल्कि  बढ़ी हुई है | अब अचानक हमें फ्रीज कर दिया गया है एक कमांड से | अजीब चेहरे ,विचित्र आकृतियां , किसी का हाथ उठा है, किसी का पाँव| फिर मूव कर रहें हैं | दौड़ रहे हैं| अब सभी बैठ गए हैं|...रिलेक्स ...चाय...| फिर से तैयार हैं सभी | लतीफ़ भाई कह रहे है सभी से, स्टिल इमेजेज बनाने के लिए|
फिर एक .., दो.., नहीं.. , तीन स्टिल इमेज बनाने के लिए कहा | पहली उस  जीवन से जुडी हुई पहले जो कभी थे, दूसरा जो अक्सर हम हो जाते हैं और तीसरा जो हम होना चाहते हैं |लतीफ़ पूछ रहे हैं ,'सभी को समझ में आ गया ?'मेरी आवाज़ निकल जाती है हां... उन्होंने सुन लिया है| पापा को , जब मैं प्री यूनिवर्सिटी में  था तब हड़ताल में लीडर होने  के कारण  सर्विस से रिमूव  कर दिए गए थे, हालाँकि बारह साल बाद कोर्ट के आदेश से बहल भी हो गए थे|  परन्तु फिर भी मैं कुंठित हो चुका था |उस समय की कुंठा में मेरी पहली इमेज, फिर मैं मिंकू के बारे में बता रहा हूँ की मेरी सवा साल की बेटी है, अभी- अभी बोलना सीख रही है| दर्पण के सामने वह अक्सर होती है और प्रतिबिम्ब देख कर बोलती है...भैया ...भ ..  य... या.. | और ऐसा एक्ट  कर के बताया | [बाद में मुझे प्रियेश और दूसरे कई दोस्तों ने बताया कि सभी लोग खासकर जयपुर वाले, जो साथ वाले कमरे में थे , उस एक्ट को बार बार कर रहे हैं | तीसरी इमेज बताई कि अब जिंदगी की हर फ़िक्र से मुक्त हो जाना चाहता हूँ| फिर सभी ने बारी-बारी से तीन-तीन स्टील इमेज बनाई और उसे व्याख्या कर बताया| कुछ नेचुरल लग रही थी कुछ ज़बरदस्ती थोपी हुई| इमेजेज पर बराबर चर्चा हो रही थी |अब खेल खेल रहे हैं अंकों वाला  | मनोज बीच में है , सभी अंक बोल रहे हैं | बारी-बारी से | अचानक बीच में मनोज निर्धारित संख्या बदल देते हैं| जहाँ भी जिस से चूक हो रही है  वह बैठता जा रहा है |सभी खेल कर बैठ गए हैं तो लतीफ़ भाई की टास्क है कि आज रात सभी अपने बारे में , किसी को दिखलाने के लिए नहीं बल्कि अपनी संतुष्टि के लिए , ईमानदारी से लिखेंगे | उस शाम कि कार्यवाही वहीँ तक है| रात में पास के कमरे से गायन की आवाजें आ रही हैं| खाने के बाद कमरों में चुटकुले और हंसी-मजाक चल रहा है| देर रात तक बन्दर बरामदों में उछल-कूद ,तोड़-फोड़ करते सुने देते  रहे|
१६-११-१९९६
सुबह मंदिरों के घंटों की आवाज़ सुनाई दी तो आँख खुली |घडी देखने को बाहर आया तो देखा,पांच बजने को थे | नीचे बरामदे के साथ लगी टोंटी से पानी पिया  तो ऊपर की ओर एक बन्दर बैठा दिखाई दिया| निवृत होकर आया और फिर रजाई में घुस गया | बाहर ठण्ड में जाकर आने के बाद इसकी गर्मी बहुत भली लग रही थी| सो आँख लग गयी| प्रियेश के अलार्म से आँख खुली| ब्रश किया, नहाया, योगासन किये | नाश्ते के बाद मिथलेश के साथ मंदिर गया| वापस आकर कपड़े बदले और नीचे हाल में पहुंचा तो महसूस हुआ कि सबसे पहले नहाने- धोने के बाद भी अनावश्यक ही देरी हो गयी| लतीफ़ भाई के नेतृत्व में वहां गतिविधियाँ जारी थीं|चहल कदमी ,तेज़ गति से चलना, पीछे चलना, दायें चलना, बाएं चलना आदि | फिर काँटों में से, काँटों पर से, पग घायल हो गए हैं , पानी में से, दलदल में से, रूई पर से होते हुए सुरक्षित स्थान पर पहुँच कर विश्राम किया | दर्द की टीस बाक़ी थी| शिशु की भावनाओं को ग्रहण कर प्रकट करते तन्द्रा से जागा | चाय पी और धूप सेंक कर फिर से हाल में जुटे| ग्रुप में स्टिल इमेजेज बनाई| तीन इमेजेज और उन्ही तीन को एक कहानी में ढाल कर प्रस्तुत करने को कहा गया | हम चाँद मल दलीप भाटी ,   मिथलेश  , रामविलास और मैं थे ,गाँव का दृश्य प्रस्तुत किया | मैंने शराबी का अभिनय किया  | दलीप काल्पनिक चिलम पी रहा था |शाम को प्रियेश ,मनोज के बारे में मुझ कह रहा था ,''यार मनोज तुम से इम्प्रेस हो गया है ,कह रहा था उस बन्दे से मैंने बात नहीं की है और न ही करना चाहता हूँ पर जब वह होता है तो मुझे भरा-भरा  सा लगता है ,लगता है जैसे मेरा कुछ  वह लगता है | सुनकर अच्छा लगा |रात में गीत-संगीत का कार्यक्रम ग्यारह बजे तक चलता रहा |बाद में कमरे में आकर हंसी-मजाक चलता रहा| गोपाल सिन्धी को केन्द्रित कर गजराज चुटकुला बाज़ी करता रहता था | भाटी निरपेक्ष सा कभी-कभी कोई कमेन्ट कस देता था| फिर गंभीरता से उसने अपने अनुभव सुनाये |
१७-११-९६

आज सुबह भी लगभग उसी समय मंदिर के घंटों की प्रति ध्वनि से ही आँख खुली, तो बेसुरा प्रियेश कोई ग़ज़ल आलाप रहा था | तेजाराम ,गजराज के शब्दों में उसके पी ए की तरह साथ रहता| मुझे जुकाम से परेशानी थी इस लिए सुबह नहीं नहाया | सुबह की सैर को गए | वहां तालाब से भाप उठती स्पष्ट नज़र आ रही थी |पक्षी पानी पर दौड़ते  से दिखाई पड़ रहे थे |  वहीँ पर चाँद मल ने योग करवाया ,कुछ आसनों के साथ | वापसी में तनूजा ने मुझ से बात करने की कोशिश की | नाश्ते के बढ लतीफ़ ने कुछ वार्म -अप एकसरसाइज़ के बाद युग्मो से मिरर इमेजेज बनवाई, कंडीशनल इमेजेज भी बनाई, प्लेट फार्म का दृश्य आदि  | हमारे समूह ने युद्ध का बनाया | फिर बताया कि सोमवार को पास के बांस खोह गाँव से बच्चे बुलवाए गए हैं उन्हें पढ़ाना होगा | हमारे ग्रुप में प्रियेश ,अमित, धर्मेश ,मिश्र और मैं थे| प्रियेश नाथू, मैं तोता और अमित थावरी बने | हाँ गोपाल भी साथ में था | दोपहर  के भोजन अवकाश के समय में मैंने नहाने का मानस बनाया | यद्यपि जुकाम के कारण सर दर्द और नाक भी बंद थी |bhojan के वक्त लतीफ़ भाई ने मुझ पर गौर कर लिया , बोले अब नहाये हो क्या ? अरे !हमने यों ही ठन्डे पानी से जल्दी की | शाम को चाय के बाद सभी समूहों ने जिस तरह भी पढ़ाना शुरू किया , हम बच्चे बन बैठे | शरारती बच्चों में गजराज और  मै ही  थे |तनूजा[ का ग्रुप पर्यावरण अध्ययन करवा रहा था ] ने कहा भी मेरी ओर इशारा करके , यह बच्चा बहुत शैतानी करता  है |खैर हमारी प्रस्तुति सबसे आखिर में थी  |अब पूरा ट्रेनिंग और ट्रेनी ग्रुप वहां मौजूद था | | रात के करीब ग्यारह बज चुके थे जब हाल से निकले | फिर नित्य धर्म निभाते हुए रात के साढ़े बारह बजे तक चुटकले , हंसी-मजाक होता रहा नायक गजराज होता था |
१८-११-९६
रात को देर से सोना और सुबह जल्दी उठना | इस रूटीन के कारण नींद पूरी होती  नहीं थी| आज बांस खोह स्कूल के बच्चे आने वाले थे | वे लगभग ग्यारह बजे पहुँच गए थे| नाश्ते के बाद  नवज्योति अख़बार देखने गया | सबकी बारी के बाद हमारी आयी |अपने पर्फोरमेंस से संतुष्टि थी हमारे ग्रुप को |  नाथू ,तोता और थावरी का मैं तोता बना और पाठ प्रस्तुतीकरण किया तो लतीफ़ भाई ने भी कमेन्ट करते हुए कहा 'तोता तो आपका परफेक्ट है" उसके बाद साथियों ने मुझे यादव य विनोद की जगह तोतेराम या तोता कहना शुरू कर दिया| फिर आज की सब गतिविधियों की चर्चा की गयी | शाम को दलीप के साथ बाहर दूकान  पर  चाय पीने गए |
१९-११-९६
आज सुबह  योग-सत्र  के बाद  थिंग पासिंग गेम , फॉर कोर्नर गेम खेले | ज़िब्रिश लेंग्वेज , टू-इन-वन ,एक घटना को काल्पनिक अदा और बयान करते बोलते जाना | शरीर के विभिन्न हिस्सों से काल्पनिक पेंटिंग बनाना |

२०-११-९६

आज नहाने  को गर्म पानी मिल गया था | तैयार होकर हाल में आया | वहां कुमार गन्धर्व का ऑडियो कैसेट बज रहा था | वार्म-अप होकर तरह-तरह के खेल खेले | किलर की खोज ,ट्रस्ट गेम आदि | टी ए फार्म भरे | खाना खाया | आज विशेष भोजन दाळ , बाटी और चूरमा था | ठेकेदार राम मूर्ति द्वारा  पूरे ट्रेनिंग में अच्छा भोजन उपलब्ध  करवाया गया | आम तौर पर जो होता है उसके विपरीत | भोजन में विविधता भी होती थी| दोपहर के भोजन के बाद यात्रा -व्यय लिया | फिर दलीप और गजराज के साथ पैदल बांस खोह , लबान तिराहे तक पहुंचा |वहां से टेम्पो पकड़ कर बांस खोह आकर जयपुर के लिए मिनी बस पकड़ी|

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