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मंगलवार, 11 मई 2010

आस
[2]

मेरे आँगन में
हर गर्मी
यों आती है
चिडिया घोंसले की
जगह तलाशती है
जामुन बौरा जाता है
तोते सामने पेड़ के
कच्चे फल
कुतरते है
दिन धुंधले नहीं
चमक भरे
सफ़ेद नज़र
आते हैं
जीवन में
आस पैदा करते

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