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yadavinod

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रविवार, 1 मार्च 2015

विवाह समारोह में कई साल बाद उनसे मिलना हुआ।
आजकल कहाँ हो?
घर पे ही।
रिटायर कब हुए?
दो साल होने को आए।
खाना पीना निपटाने के बाद उनके पुराने ऑफिस साथी जैसे उनसे पीछा छुड़ाना चाहते थे। जिस व्यक्ति को "मैं चलूँ, मैं छोड़ के आऊं? " कह के अपने नम्बर बनाने की कोशिश करते थे वे अपने आप को छिपाते फिर रहे थे और मुर्गे की तलाश में थे जो उन्हें अड्डे तक छोड़ भी आए और पुराने व्यवहार के अनुसार नंबर भी उन्ही के बना दे। ऑफिस का मतलब दफ़्तर होता है तो ऑफिसर का अर्थ दफ़्तरी होता होगा ।पर आमतौर पर इसका अर्थ अधिकारी से लिया जाता है। इसी शब्द की दीवार के इस तरफ और उस तरफ कुछ वर्गीकरण जाने अनजाने या तो हो जाता है या फिर देखा देखी भी कर दिया जाता। धारणा ऐसी बना ली गयी कि अधिकारी कुर्सी से चिपका रहे और काम अपने आप होता रहे। माहौल देख कर रंग बदलना भी कला के दायरे में आता है। रिश्तेदारी में एक बड़े पुलिस अधिकारी के यहां जिन जवानों को "रे छोरा ! "की गरज़ पर चकरी होते देखा है वहीँ सड़क पर रेहड़ी रिक्शेवाले पर रौब झाड़ते भी झांका है। अपने को अधिकारी बताने जतलाने वालों को सक्षम जनप्रतिनिधि के यहां रिरियाते भी देखा है और मातहत पर झपटते भी देखा है। दरअसल मैं मैं का माहौल था और मैं से बड़ी मय होती थी जो शाम को मैं को कुछ हद तक मार देती थी। क्योंकि उस समय कुर्सी नहीं होती थी। असल जड़ कुर्सी ही होती है। कुर्सी ना होने पर पूछ कहाँ होती है!
पुराने साथी धीरे धीरे खिसक लिए थे। मातहत ने देखा "आओ सर मैं बस अड्डे तक छोड़ देता हूँ।"

मोटरसाइकिल पर पूर्व अधिकारी को बिठा कर अड्डे की तरफ़ जाते पुरानी डी वी डी दिमाग में चल पड़ी। मोबाइल फ़ोन लगता है कि हर फ़साद की जड़ हैं। हालाँकि मोबाइल फ़ोन का चलन नया नया था पर उन दिनों दफ्तर के कार्मिकों ने फ़ोन लगभग ले रखे थे। विभागीय निर्देशों में फ़ोन के प्रयोग पर कार्यालय समय में प्रतिबंध था। ये विरोधाभासी  था कि स्थानीय अधिकारी रात बेरात भी काम के लिए पकड़ करने के लिए मातहत के नम्बर पकड़ लेते थे ।ऊपर से आदेश आने के बाद मातहत को सप्ताह में तीन तीन दिन के लिए दो जगह काम करने के लिए कहा गया था। छुट्टी का दिन था। अधिकारी के अधीनस्थ का फ़ोन आया। मातहत ने सुना। ऑफिस आ जाओ बहुत ज़रूरी काम है। आ नही सकता। मजबूरी है। वो निश्चिन्त हो गया था कि बस से आना जाना करने वाले विवाह समारोह में मिलने वाले अधिकारी का फोन आया।
"मैं आपको दूरभाष पर निर्देश दे रहा हूं।"
"दूरभाष विभाग ने नहीं दिया।"
ऐसा सुनते ही फ़ोन काट दिया।
बात आई गयी हो गयी। मातहत निश्चिन्त था कि उस घटना के बारे में कोई बात नही हुई।
लेकिन अधिकारी मातहत को सबक सिखाना चाहता था। उसने घटना को नही भूला था।
राजधानी से आए एक और बड़े अधिकारी दौरे पर थे। सभी हॉल में दरबार सा लगा कर बैठे थे। मातहत अपने कमरे में काम में व्यस्त था। चपरासी आया।
"साहब ने बुलाया है।"
सामने दरबार को देख कर मातहत चौंका और उसने महसूस कर लिया कि उसके उस दिन के व्यवहार को अपराध बना कर पेश किया गया है।
""हाँ वो एक बार और बोलना जो फ़ोन पर कहा था।"
"मैने कहा था दूरभाष विभाग ने नहीं दिया।"
वाक्य ने जैसे पूरे दरबार को सन्न कर दिया था। दरबार को ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। वहां गिड़गिड़ाने की अपेक्षा थी। माफ़ी की चाहना का अनुमान था।
"ऐसा करो आप एक सीट छोड़ दो।" राजधानी से आये बड़े अधिकारी ने कहा।
"अभी छोड़ दूँ?"
"अभी क्या कर रहे हो?"
"मीडिया कैंपेनिंग वाली फ़ाइल देख रहा था।"
..."करो...कर लो।" राजधानी वाले अधिकारी को भी लगा कि काम महत्व का है हर कोई कर नही सकता।
"ठीक है सर आपके लिए बस भी लगी खड़ी है।"
पूर्वाधिकारी  जाते हुए पुराने मातहत की पीठ बस में चढ़ने से पहले देख पा रहे थे और सोच रहे थे।
"ये बन्दा है क्या, अभी तक भी समझ में नही आया।"©

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