शहर से निकलते ही बस टिब्बों पर बनी ऊँची नीची सड़क पर बढ़ी चली जा रही थी। बच्चे खिड़की से दोनों तरफ के टिब्बे ही देख पा रहे थे कि उनके बीच से एक ओर ट्रेन दिखाई पड़ी। काफी दूर तक फिर तो जैसे वो भी बस के बच्चों से आँख मिचौनी सी खेलती नज़र आई। लगभग साठ डिब्बों की कोयले से भरी ट्रेन कभी टिब्बों के बीच गुम हो जाती कभी फिर से प्रकट होती। डीज़ल इंजन की तो अपनी शान ही अलग होती है जो बरबस आकर्षित करता है। कभी अपनी गति से और कभी इतने सारे कोयलों से भरे डिब्बों को आराम से टिब्बों की चढ़ाई उतराई पर चढ़ते उतरते। ईंधन की शक्ति का कमाल।
मानव सभ्यता। इतने काम सबमे ऊर्जा की आवश्यकता। ये कोयले तापीय विद्युत् उत्पादन इकाई के लिए जा रहे थे। वहीं जा रही थी बस भी। जिसमे थे बच्चे उमंग और उत्साह से भरे। रेलवे समपार जिसे आम बोलचाल में रेल फाटक कहा जाता है पर प्रतीक्षा करनी थी। वही ट्रेन वहां से गुज़रने वाली थी। विद्युत् उत्पादन परियोजना परिसर की सीमा में बस प्रविष्ट हो चुकी थी। सुरक्षा चौकी पहुँच चुकी थी। सुरक्षा बल मुस्तैद। औपचारिकताओं के पश्चात् बस मुख्य उत्पादन इकाई के निकट जा सकती थी। गाड़ी जो कोयले के डिब्बों से भरी । इन्हें अब हाइड्रो लिक्स मशीनों से ख़ाली किया जायेगा। कोल क्वालिटी चेक। भार का आकलन । काले बुरादे की बारिश। हवा में काला पन । रेलवे से सेवा निवृत कार्मिक । वे यहां पैंसठ की वय तक काम कर सकते हैं। खुद परियोजना के इंजन अलग से हैं। मशीनों की आवाज़े। उसमें कितना ही ज़ोर से बोलो क्या बोला जा रहा है का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। पानी , कोयला,अग्नि,ताप, भाप, टरबाइन, पाइपों का जाल,कम्पन्न,पंखे, धुआं, उड़ती राख-फ्लाई ऐश, बिजली ट्रांसमिशन। कई जगह लिखा है। "हेलमेट ज़ोन।" कहीं कहीं लिखा है "फ्लाई ऐश फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है।मास्क का उपयोग करें।" "आग लगने पर ज़ोर से आवाज़ दें । साथियों को सूचित करें।" यानि क़दम क़दम पर ख़तरा है पर संघर्ष ज़रूरी है। विकास के साथ ख़तरे भी जुड़े हैं। दुर्घटनाओं के साथ साथ स्वास्थ्य के लिए भी। काफी वर्षों पहले यही टिब्बे दुर्गम माने जाते थे। रास्ते के नाम पर पैर रेत में घुसते तो मशक्कत से जैसे खींच कर बाहर निकालने होते। पर्यटकों की दृष्टि से सुनहरी धोरे। आज इनका सुनहरापन विलुप्त हो चुका है। हर जगह टिब्बों की रेत जैसे कृष्णवर्णी हो गयी है। काफ़ी समय तक अनुपयोगी रही फ्लाई ऐश का सीमेंट और ईंटों के निर्माण में उपयोग होने लगा है। वहां काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की क़ीमत पर हमारे लिए ऊर्जा के उत्पादन में लगा है। ऊर्जा के सीमित उपयोग से हम उन्हें उनके बेहतर जीवन के लिए सहयोग कर सकते हैं।©
मानव सभ्यता। इतने काम सबमे ऊर्जा की आवश्यकता। ये कोयले तापीय विद्युत् उत्पादन इकाई के लिए जा रहे थे। वहीं जा रही थी बस भी। जिसमे थे बच्चे उमंग और उत्साह से भरे। रेलवे समपार जिसे आम बोलचाल में रेल फाटक कहा जाता है पर प्रतीक्षा करनी थी। वही ट्रेन वहां से गुज़रने वाली थी। विद्युत् उत्पादन परियोजना परिसर की सीमा में बस प्रविष्ट हो चुकी थी। सुरक्षा चौकी पहुँच चुकी थी। सुरक्षा बल मुस्तैद। औपचारिकताओं के पश्चात् बस मुख्य उत्पादन इकाई के निकट जा सकती थी। गाड़ी जो कोयले के डिब्बों से भरी । इन्हें अब हाइड्रो लिक्स मशीनों से ख़ाली किया जायेगा। कोल क्वालिटी चेक। भार का आकलन । काले बुरादे की बारिश। हवा में काला पन । रेलवे से सेवा निवृत कार्मिक । वे यहां पैंसठ की वय तक काम कर सकते हैं। खुद परियोजना के इंजन अलग से हैं। मशीनों की आवाज़े। उसमें कितना ही ज़ोर से बोलो क्या बोला जा रहा है का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। पानी , कोयला,अग्नि,ताप, भाप, टरबाइन, पाइपों का जाल,कम्पन्न,पंखे, धुआं, उड़ती राख-फ्लाई ऐश, बिजली ट्रांसमिशन। कई जगह लिखा है। "हेलमेट ज़ोन।" कहीं कहीं लिखा है "फ्लाई ऐश फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है।मास्क का उपयोग करें।" "आग लगने पर ज़ोर से आवाज़ दें । साथियों को सूचित करें।" यानि क़दम क़दम पर ख़तरा है पर संघर्ष ज़रूरी है। विकास के साथ ख़तरे भी जुड़े हैं। दुर्घटनाओं के साथ साथ स्वास्थ्य के लिए भी। काफी वर्षों पहले यही टिब्बे दुर्गम माने जाते थे। रास्ते के नाम पर पैर रेत में घुसते तो मशक्कत से जैसे खींच कर बाहर निकालने होते। पर्यटकों की दृष्टि से सुनहरी धोरे। आज इनका सुनहरापन विलुप्त हो चुका है। हर जगह टिब्बों की रेत जैसे कृष्णवर्णी हो गयी है। काफ़ी समय तक अनुपयोगी रही फ्लाई ऐश का सीमेंट और ईंटों के निर्माण में उपयोग होने लगा है। वहां काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की क़ीमत पर हमारे लिए ऊर्जा के उत्पादन में लगा है। ऊर्जा के सीमित उपयोग से हम उन्हें उनके बेहतर जीवन के लिए सहयोग कर सकते हैं।©
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