शनिवार, 14 फ़रवरी 2015
तब बैंक की नई नौकरी और नई जगह। शामें खींच कर जैसे किसी ने लम्बी कर दी थीं। छोटा सा कस्बा छोटा बाज़ार। सन्डे हाट वहीं देखा। मिटटी के तवे पहली बार देखे। पर तवे की ज़रूरत अभी पाली नहीं थी। होटल कह लो ढाबा बोल दो। यहाँ का फाइव स्टार यहीं था। "तवा की खाओला के तंदूर की" ताई जैसे मनुहार सी करती थी। कमरे में खाना बनाने की खेचल होती नही थी। सुबह की चाय के बर्तन भी शाम की चाय बनाने से पहले ही धोये जाते थे। सो बैंक टाइम के बाद इधर उधर डोलने का समय निकाल लेते थे। साथी ने कहा कि पास के जंगल में मंदिर है। यूँ कभी मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च में जाने से गुरेज़ नहीं किया। सो उत्सुकतावश मंदिर की ओर चल पड़े। मकान बस्ती सड़क छोड़ कर जंगल की तरफ जाने वाली डंडी पर पैर पड़ गए थे। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण ऊबड़ खाबड़ जगह थी । ढलान पर कई बार पाँव स्लिप होता किसी ढेले के आ जाने के कारण। यार ! इन पे चलना भी अभ्यास मांगता है। वरना तो अब तक कई बार ज़मीन सूंघ चुके होते। थोड़ी ऊंचाई की तरफ़ जा कर रेलवे ट्रैक था। डबल लाइन्स वाले । अप डाउन। कोई क्रासिंग के लिए ट्रेन को किसी स्टेशन पर पिटना नहीं पड़ता था। पटरी पर चलना भी संतुलन मांगता है। वैसे पटरी पर चलना आपराधिक मामला भी बनाता है। जैसे ही क़ानूनी अहसास हुआ तो साथी को बोला कि कोई ट्रेन आ सकती है तो नीचे उतर कर ट्रैक के समानांतर चलना ज़्यादा सुरक्षित होगा। देखो क्या ? अरे डरो मत। जब मेरे पैर ठिठके तो साथी बोला इसे पाटला गोह कहते हैं।पता नही भई ना तो पहले नाम सुना न देखी। हम शहरों में पलने बढ़ने वाले कई क़ुदरती चीज़ों से वंचित रह जाते हैं। बातों बातों में सामने मंदिर दिखने लगा था। मंदिर की दूरी पाँव समझाने लगे थे। कष्ट में श्रद्धा और हिलोरे लेने लगती है। यहाँ तो मंदिर पर कोई ताला ही नहीं। शहर के मंदिर को तो पुजारी ताला लगा के जाता है कहीं जाना हो तो। लोहे की कड़ियों वाले पत्तियों वाले भारी दरवाज़े भुतहा फिल्मों के गेटों की तरह आवाज़ करके खुले। यो देवरो छ जी। शांत माहौल। अच्छा लगा यार यहाँ आकर। आहा क्या सुकून है। ऊपर से पसीजे शरीर पर ठण्डी हवा शीतलता का पंखा झल रही थी।
कई साल गुज़र गए थे। सेवा की जगह तब्दील हो गयी थी। घर बस गया था। बेटी भी आ गयी थी जो लगभग छह साल की हो गयी थी। क़स्बे में किसी शादी में निमन्त्रण था। सामाजिक समारोह में शरीकी के पश्चात उसी मंदिर में जाने की इच्छा बलवती थी। पत्नी बेटी को बोला चलो मंदिर में भी धोक करते चलते हैं। जहाँ तक गाड़ी जा सकती थी वहां तक जा कर उसी पगडण्डी को विचारते सोच आगे ले जा रही थी। लेकिन वहां खड़वंजा बन गया था। रास्ता सुगम हो गया था। लगता था मंदिर सरक कर बस्ती के नज़दीक आ गया था। पर वास्तव में था ऐसा कि मन्दिर के आसपास मकान नज़र आ रहे थे। मंदिर की चार दिवारी हो गयी थी। पुजारी भी तैनात कर दिया गया था। संभवतः उसके अधिकार भी तय कर दिए गए थे।
हांजी बोलो।
दर्शन करने थे।
कपाट बन्द हो गए हैं अब शाम की आरती के समय खुलेंगे। बेटी ने कहा पापा ! भगवान जी कहाँ हैं ?मैं इतना ही कह सका। "बेटे भगवान जी के आराम करने का समय है वो आराम कर रहे हैं। अपन अब लेट हो रहे हैं। फिर कभी आएंगे।" बेटी ने बात पे भरोसा कर लिया था...शायद, और हम सामने ही दिखाई दे रही हमारी गाड़ी की तरफ़ बढ़ चले थे।©
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें