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yadavinod

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मंगलवार, 27 जनवरी 2015

सोशल साइट्स के चस्के से शायद ही कोई अछूता। इसमें भी नीले रंग वाली के लोग ज़्यादा ही दीवाने। मुंहकिताब । उसमे मुंह तो नज़र आते पर कुछ एक के, सबके वो भीं नहीं। किताब सी बात तो नज़र कहीं आती नहीं थी फिर मुंह किताब नाम क्या सोच कर रखा होगा। मालिक ने कुछ सोच के ही रखा होगा। फिर कुछ कहते भी तो हैं कि नाम में क्या रखा है? तो जिसने उसपे अपना नाम लिखाया उसे कहते प्रोफाइल बनाना।
 अरे पहले आई डी बनाओ।
आई डी क्या होती है?
 ईमेल आईडी ।
ईमेल आईडी ?
अरे यार। जैसे घर का पता नही होता? वैसे नेट पे,अरे यार नेट याने इंटरनेट पे डाक मंगवाने भेजने का पता होता है। तो ईमेल  आईडी से साइनअप करना होता है।
 छोड़ यार मैं ही तेरी आईडी बना दूंगा और मुंहकिताब पे प्रोफ़ाइल भी। अब ठीक ?
पास वर्ड तेरा फोन नंबर रख दूंगा। फिर तू चाहे तो कभी बदल लेना।
नई दुनिया। आभासी दुनिया। वर्चुअल वर्ल्ड। पर असली से भी अधिक आकर्षक। नए नए चेहरे। नाम भी अजीब। जगह भी कुछ सुनी कुछ अनसुनी। अच्छा। ये रिक्वेस्ट कहलाती है। जाने अनजाने लोगों से ।सबको की जा सकती है ये रिक्वेस्ट। अगर किसी ने अपनी सेटिंग्स विशेष ना की हो। कई बार मुंह किताब की तरफ से लिखा आता। आप अपने जानने वाले को ही मित्र अनुरोध भेज सकते हैं। पर फ़ितूर चढ़ा हो तो चूहे से क्लिक ही तो करना है। लो जी अब आप अगले पंद्रह दिनों तक किसी को रिक्वेस्ट नही भेज सकते। ब्लॉक्ड । अभी ये ही तो सीखा था और ये भी प्रतिबंधित। फ़ोटो कैसे चढ़ा लेते हैं लोग इस किताब पे ? अच्छा इस पे तो बात भी कर सकते हैं। अच्छा इसी को चैटिंग कहते हैं। पुस्तकें सबसे अच्छी मित्र होती हैं ये तो सुना था। पर इस किताब में इतना मन लगेगा कि घर के नाराज़ होंगे।
एक दिन मुंहकिताब खोलने पर पाया कि किसी क्रिस्टिना की रिक्वेस्ट आई हुई है। विदेश से। अपने तो पुरखे भी कोई विदेश कमाने गए हों ऐसा भी बुजुर्गों ने नही बताया। फिर ये कौन ? तू कौन मैं खामखाँ। चलो। रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर लेते हैं।
आप मुझे नही जानते। मैं भी आपको नहीं जानती। मेरा और आपका एक कॉमन मित्र था। वो मुझसे बात नहीं करता। उसने मुझे ब्लॉक कर दिया है।
तो मैं क्या करूँ?
उससे कहो मुझसे बात करे।
मैं नही कह सकता।
क्यों?
आपको मैं जानता नहीं और उस से मैं इतना वाकिफ नही कि कह सकूँ। बस एक ही शहर के होने के कारण दोस्त है वो भी मुंहकिताब पर। फिर भी आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ ।
बात आई गयी हो गयी। सुबह बात करुँगी। शाम को बात करुँगी। ठीक है। ठीक है। मेरी वो मदद करता है। अपने देश के किसी साथ में बिज़नेस करने वाले के बारे में बताती। मैं करज़ाई हूँ। इतना क़र्ज़ बाकी है। अपने मरहूम दोस्त जो आर्मी में था का भी ज़िक्र किया करती। उसीके दिलवाये फ्लैट में रहती हूँ। संयमित आदान प्रदान होता था बातों का। काफी दिनों तक अबोला रहा। कुछेक फोटोज पर लाइक या कॉमेंट आते रहे लेकिन चैटिंग बन्द थी। एक दिन मैने ही उसकी प्रोफाइल देखी। उसमें तो ऐड फ्रेंड का ऑप्शन आ रहा था। उत्सुकतावश इनबॉक्स में पूछा । आपने अन्फ्रेंड कब किया?
मैं ये देखना चाहती थी कि तुम मेरे बारे में कुछ सोचते हो या नहीं।
ये तो कोईं बात नहीं हुई।
मेरा अपना परिवार है बच्चे हैं उनके लिए भी कई बार टाइम निकालना मुश्किल होता है।
मैं तुम्हे दोबारा रिक्वेस्ट भेजती हूँ।
उसकी रिक्वेस्ट आई।
कई दिनों तक रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी रही।
एक दिन देखा उसने अपनी रिक्वेस्ट कैंसिल कर दी थी©

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