उत्तर पुस्तिका पर
स्याही की जगह
लिख रहे हैं
आंसू रंगहीन इबारत
जिस हाथ में ...
होनी चाहिये कलम
उसमें है कंपन
वीक्षक की पैनी निगाह
भांप ही लेती है दुविधा को
सर चक्कर आ रहे हैं
कुछ खाया था ?
नहीं ...सब सो रहे थे
जब घर से चली
...मम्मी...?
सर ! मम्मी पापा नहीं हैं
पेपर आता है ?
सर ! चक्कर आते हैं
आसपास ही ही की
फुसफुसाहट होती है
वीक्षक भी लाचार है
बस वो भी ख़ुदा कहां
सोच ही सकता है
बोर्ड परीक्षा...
जीवन परीक्षा क्यों बन जाती है©
स्याही की जगह
लिख रहे हैं
आंसू रंगहीन इबारत
जिस हाथ में ...
होनी चाहिये कलम
उसमें है कंपन
वीक्षक की पैनी निगाह
भांप ही लेती है दुविधा को
सर चक्कर आ रहे हैं
कुछ खाया था ?
नहीं ...सब सो रहे थे
जब घर से चली
...मम्मी...?
सर ! मम्मी पापा नहीं हैं
पेपर आता है ?
सर ! चक्कर आते हैं
आसपास ही ही की
फुसफुसाहट होती है
वीक्षक भी लाचार है
बस वो भी ख़ुदा कहां
सोच ही सकता है
बोर्ड परीक्षा...
जीवन परीक्षा क्यों बन जाती है©
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें