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yadavinod

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शनिवार, 20 दिसंबर 2014

कभी देखी थी तकलीफ़ बड़ी
सोचा था सेवा करेंगे जन की
अरसा लगा ज्ञान अर्जन में भी
पर जज़्बा बना रहा तब भी
जानवर ओ आदम का लहू और हर गंदगी
जिससे घिन्न करती हर ज़िन्दगी
पर परहित की भावना से
हाथ लगाता छूता सीखता
कैसे हल होगी समस्या
शोध और समाधान खोजता
देकर परीक्षा टेस्ट इम्तेहां
कभी भूख और कभी प्यास
दबाता रहा वो लेके इक आस
जो घर वालों को भी उस से थी
डॉक्टर लगेगा नाम से पहले
पहचान मिलेगी जिससे
माँ पिता बहन भाई गर्वित
पीड़ा हरेगा उनकी जो व्यथित
दर्जा भगवान तक का
अकस्मात् मिलता है कहां
एक दो नौ और फिर सौ
बात से बात निकलती है
तब हाथ के शफ़ा का होता है चर्चा©

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