लोक जुम्बिश परियोजना अंतर्गत दक्ष प्रशिक्षक अभिमुखीकरण शिविर नईनाथ धाम [श्री बलराम आश्रम ] दौसा
१८ मई ९७ से २५ मई ९७
जयपुर, प्रातः जल्दी उठ कर तैयारी की . मासी का पूरा परिवार मनीषा की शादी के सिलसिले में साढ़े छः बजे रवाना हो गए . मैंने गरम रोटी बनाने के बजाय दही से दो ठंडी रोटियां खायी और करीब साढ़े सात बजे ताला लगाकर चाभियाँ पड़ोस में देकर निकल लिया . लोकल बस सेवा से घाट गेट और वहां से जीप द्वारा सवा नौ बजे बांसखो फाटक उतरा . वहां कुछ देर इंतज़ार के बाद 'जुगाड़' से बांसखो गाँव आया . कोई भी साथी नज़र नहीं आया तो पैदल ही नईनाथ की तरफ चला . गर्मी में तीन किलोमीटर से ज्यादा चल कर करीब सवा दस बजे श्री बलराम आश्रम पहुँचा तो पसीने से लथपथ हो चुका था . मुझ से पहले आ चुके थे प्रबोधक [बाद में पता चला ] मुक़द्दर मोहम्मद शेख जो सिरोड़ी [जिला सिरोही ] से हैं . कुछ पल तख्त पर बैठने के बाद दूसरी मंज़िल के एक कमरे में सामान रखा, गद्दा बिछाया , लेटा तो नींद आ गयी . करीब १२ बजे संधान से साथ आ गए जिनमे संजय, सुनील और प्रशांत थे . चाय के साथ तैयारी बैठक शुरू की गयी . सबसे पहले कमरों की नम्बरिंग की गयी . अन्य प्रबोधकों में चाँद मल थोड़ा देरी से थे जाहिद व शर्मा भी थे . तैयारी बैठक में निश्चित किया गया कि कल प्रतिभागियों के आने पर उन्हें अस्थायी व्यवस्था बताएँगे . .बातचीत में पता चला कि तेरह ब्लॉक बसेडी, लाडपुरा , खमनौर , जैसलमेर , मनोहरथाना, आबूरोड , कुशलगढ़ , बाड़मेर , बारां , बड़ी सादड़ी , कोटडा और गंगापुर से करीब दो सौ लोगों को बुलवाया गया है . और तब ही मुझे इस बात का भी पता चला कि मैं प्रशिक्षण लेने नहीं बल्कि देने वालों में से हूँ . गजराज भी दोपहर बाद आ चुका था . मैं गजराज और गोपाल छः नंबर कमरे में शिफ्ट हो गए . शाम को बाहर घूमने निकल पड़े . आज ही यह बात भी निश्चित कर ली गयी कि कल सामग्री वितरित की जाएगी जिसमे कापी, पेन , अभियान गीत , व कार्ड शीट आदि होंगे . परिचय में संभागी कार्ड शीट पर अपना नाम लिख कर कोई चित्र बनायेंगे . रात के खाने के बाद ही कमरे में आये एक बार तो छत पर सोने का मन किया पर फिर कमरे में ही सो गए .
१९ मई ९७
सबेरे साढ़े पांच बजे उठ गया . नज़दीक के एक ढाबे पर गजराज व गोपाल के साथ चाय पीने गया . इक्का -दुक्का संभागी तो कल रात को ही आ चुके थे . पर आज दोपहर तक ज़्यादातर लोग आ गए . इस से पहले दस बजे तक जितने भी संभागी आ गए थे उन्हें नीचे हाल में इकठ्ठा होने को कहा गया . सरस्वती वंदना से सत्र आरम्भ किया गया . राजेश भारद्वाज भी आ गए थे . संभागियों को पंजीयन प्रपत्र भरने को दिए . इसके बाद मेरे सुझाव के अनुसार मिश्रित ब्लॉक्स की ग्रूपिंग की गयी . ग्रूप बताने के बाद [ तब तक तीन ग्रूप बनाये गए थे] एक को वहीँ सेन्ट्रल हाल, दूसरे को ऊपरी मंज़िल के बड़े कमरे और तीसरे को जांगिड़ धर्मशाला पहुँचने को कहा गया . इसके बाद समूहगत गतिविधियाँ शुरू की गयी . संभागियों को कार्ड शीट देकर नाम लिख कर कोई भी चित्र बनाने और सीने पर लगाने को कहा गया . फिर राजेश ने नमस्ते रेलगाड़ी वाली गतिविधि अपनाई . नाम परिचय के बाद 'मामाजी ने लड्डू...' खेल खेला . करीब एक बजे प्रथम सत्र का अवसान किया गया . मेरा उपवास होने के कारण मैं चाय पीने सुबह वाली दूकान पर गया तो उसने मुझे गिलास धोने को कहा , मैंने कहा सुबह तो नहीं धोया था , फिर भी मैंने चाय पीकर गिलास धोकर पैसे दिए . कुछ देर आराम किया . तीन बजे फिर बुलाया गया था . डाक्टर राघव प्रकाश ने आमुखीकरण, अभिमुखीकरण, ६-१४ आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं की शिक्षा पर बताया. साढ़े पांच बजे संभागी फिर इकट्ठा हुए . संभागियों की संख्या बढ़ चुकी थी . एक और ग्रूप बना कर उनके लिए हरियाणा धर्मशाला नियत की गयी . सभी को उनके निवास व्यवस्था के बारे में बताया गया . चाय पीने बाहर निकल गए . नौ बजे तक छत पर लेटा रहा . रात्रि सत्र में गीत वगैरह के बाद कानाफूसी गतिविधि की गयी. भजन आदि के बाद ' होंगे कामयाब ...' से समापन किया गया . करीब ग्यारह बजे शेखर, कृष्णावतार , कोर ग्रूप मीटिंग करने हमारे कमरे में आये . हाल में मुझे शेखर ने कल हरियाणा धर्मशाला वाले ग्रूप में जाने को बोला था अब कोर ग्रूप में बोला कि नहीं जाना है .
२० मई ९७
सुबह सवा पांच बजे उठा तब भी शौचालय बुक थे , सो जंगल गया . लौटकर नहाने के लिए इधर-उधर घूम कर मीणा धर्मशाला की टोंटी तलाश की . गजराज के साथ वहां नहाकर आया . व्यायाम सत्र कृष्णावतार ने कराया . कल का कार्य अंजू को सौंपा गया . नाश्ते के बाद साढ़े आठ बजे फिर से हाल में आये . खमनौर से सुखमणि सैनी और कोटा से उमेश करके दो संभागी आज आये . तू ही राम से प्रार्थना सत्र शुरू किया गया . दोहा वाचन किया गया . आज का दोहा..."तुलसी इस संसार..."पर चर्चा, अर्थ और व्याख्या की . एक्शन सॉंग "चार पैसे होते..." कराया गया .समूह ने भित्ति पत्रिका और प्रतिवेदन प्रस्तुत किया . कोई भी वाद या परंपरा किस तरह शुरू हो जाती है...पर शेखर ने कहानी सुनाई. जिसका सार यह था कि किस प्रकार किसी आश्रम में हवन करते हुए पालतू बिल्ली उछल कूद , तोड़-फोड़ करती तो उसे बांधना शुरू कर दिया . कालांतर में बिल्ली नहीं होते हुए भी हवन के समय कहीं से बिल्ली लाकर बांधी जाने लगी . एक संभागी ने कहावत बताई " गैले-गैले चाल , भले ही बेर लागे "साक्षरता गीत .."मै तो पढवा जाऊं " गंगापुर की त्रिमूर्ति [ वहां के सुभाष नकड़ा, कुमेर लाल और उमेश एक साथ बैठते थे ] ने सुनाया . ताम झाम सा, मोटा सोटा और चूहों म्याऊ सो रही वाले क्रिया गीत करवाए. इसके बाद "शिक्षा क्या व क्यों ?" में प्राथमिक शिक्षा की वर्तमान स्थिति पर चर्चा करवाई गयी . फिर उसे कार्ड शीट पर लिखने को कहा गया समस्याओं पर राजनीतिक हस्तक्षेप , अभिभावकों का असहयोग , बोझिल पाठ्यक्रम और शिक्षकों को अन्य कार्यों में लगाने पर ज्यादा ज़ोर था .इसके बाद पोस्चर पासिंग और क्लैप पासिंग का खेल कराया . इसके बाद पहचान गतिविधि करवाई गयी .इसमें सभी का मुंह दीवारों की तरफ करवाकर एक को बीच में कपड़ा ओढ़ाकर मिसिंग पर्सन को पहचानना था कोई भी न पहचान पाया तो कपड़ा ही हटाया गया. विद्यालयों की स्थिति आदर्श नहीं बन पाना पर चर्चा में पिछले बिन्दुओं की ही पुनरावृत्ति हुई . सभी को लोक जुम्बिश -एक परिचय पुस्तिका वितरित की गयी. कुछ परिचय शेखर ने दिया.क्रिया गीत कराया गया. रात्रि सत्र में भाटी को डायलोग डिलीवरी का बोला गया . जैमिनी ने ४ को प्रत्येक बार ४ बार इस्तेमाल करके ० से १० तक की संख्या निकलने की टास्क दी गयी . तोता कहानी पढने को कहा गया . इस पर विचार मंथन को व विचार रखने को कहा गया .हमारे निवास कमरा नम्बर छः में ही कोर मीटिंग हुई .
21 मई ९७
सुबह उठने के बाद नहा धो कर ही साढ़े छः बजे के व्यायाम सत्र में आ गया. अंजू नकड़ा ने आज व्यायाम करवाया . नाश्ते के बाद फिर इकट्ठा हुए तो गीत भजन के बाद दोहा वाचन पर चर्चा हुई . १० बजे की चाय के बाद टास्क रिपोर्टिंग में १९ और २० की गतिविधियों का प्रतिवेदन तैयार करना था इस को अलग -अलग भागों में बांटा गया था . दो दिन में क्या हुआ, सत्र कौन से थे , क्या करवाया , उद्देश्य क्या थे ? किस सामग्री का प्रयोग किया गया . तीन बाते जो अच्छी लगी , कमियां क्या लगी ?सुधार के लिए क्या सुझाव ? प्रशिक्षण अवधि के कम होने की शिकायत , संभागियों की अधिक संख्या से परेशानी, भोजन अवकाश के बाद " घोड़े ओ घोड़े..." क्रिया गीत करवाया . सम्प्रेषण की गतिविधि के बारे में बताया गया. इसमें काल्पनिक गेंद तथा उलट पलट वाली गतिविधि करवाई.सम्प्रेषण के बारे में बताया गया कि शाब्दिक हाव भाव , आँखों द्वारा स्पर्श, तथा लिखित प्रकार हो सकते हैं . प्राथमिक शिक्षा में सम्प्रेषण संकट के कारण शिक्षक के सन्दर्भ में उच्चारण स्पष्ट न होना, कक्षा में अधिक शोर, स्तरीय भाषा का प्रयोग न होना, शिक्षक व विद्यार्थी में शारीरिक व भावनात्मक दूरी. बच्चे के सन्दर्भ में उसका मंदबुद्धि होना, बुद्धिलब्धि समान न होना, बालक का मानसिक रूप से कक्षा में अनुपस्थित होना. भाटी ने इसके बाद तेज़ चला कर" ५० किलोमीटर का सफ़र" करवाया . सभी थकान के बाद लेट गए शव आसन की मुद्रा में . तन्द्रा में भाटी ने पिता का पुत्र के नाम पत्र पढ़ कर सुनाया. सभी स्वाभाविक रूप से सम्मोहन की स्थिति में थे. सभी को उनके बचपन की ओर लौट जाने और उसकी याद में खो जाने को कहा गया. सत्र समाप्ति के बाद बाहर चाय के लिए गए . लौटकर खाना खाया और रात्रि सत्र में गीत भजन के बाद हाव भाव प्रकट करते हुए अपना नाम बताने को कहा गया. इसके बाद सुख, दुःख, डर , क्रोध फॉर कोर्नर गेम कराया. फिर चार बास का गेम करवाया. जिसमे चार बासों [मोहल्लो] एक योजना बताई जिसमे नीम और आम के पेड़ लगाने थे.कोर ग्रूप की मीटिंग रात साढ़े ग्यारह बजे तक चलती रही.
२२ मई ९७
आज प्रातः उठ कर नहाने के लिए मीणा धर्मशाला गए तो वहां पहले से ही काफी भीड़ थी.क्योंकि एक तो आज पूर्णमासी थी और दूसरी बात आज पांचाल ब्राह्मण समाज की ओर से सामूहिक विवाह का आयोजन था. इसलिए नहाने के लिए दूर के एक नल पर जाना पड़ा. व्यायाम सत्र सुनील द्वारा योग क्रियाओं के ज़रिये संपन्न हुआ . नाश्ते के बाद प्रार्थना सत्र में अबू रोड से आई महिला संभागियों ने नई प्रार्थना गाई. संभागियों को "तोता कहे सो कर खेल करवाया गया.मिरर गेम कराया. ट्रस्ट गेम कराया. भोजन अवकाश के बाद नाटक क्या है ? पर चर्चा की गयी. नाटक औपचारिक व अनौपचारिक हो सकते हैं.अध्यापन में नाट्य का प्रयोग कैसे किया जा सकता है पर चर्चा की गयी. इसके बाद शिक्षा , कल आज और कल पर तीन अलग ग्रूपों को नाट्य प्रस्तुति करने को कहा गया. आज कोर मीटिंग नीचे हाल में ही हुई. रात्रि सत्र के बाद ऊपर कमरे में हंसी मजाक चल रहा था कि करीब एक बजे एक सांड ऊपर चढ़ आया और सोते से जाग गए संभागियों के शोर मचने से घबरा गया और दूसरी मंज़िल पर भागने दौड़ने लगा. कुछ देर बाद सीढ़ियाँ उतरा तो सभी ने राहत की सांस ली. दोपहर के भोजन में आज दाल बाटी और चूरमा था.
२३ मई ९७
आज के सत्र में चर्चा थी कि क्या परम्पराओं में या मान्यताओं में कोई वैज्ञानिक तर्क होता है ? लंच के बाद गुटर गूं क्रिया गीत करवाया गया. स्त्री-पुरुष संबंधों पर चर्चा की गयी. शाम को विभिन्न सामग्री रंग स्याही, मोमबत्ती, अखबार के टुकड़े , धागे आदि देकर सृजन शीलता करवाई गयी. एक बुजुर्ग संभागी भंवर लाल जो चित्रकला में एम ए थे , ने अलग डिज़ाइन बनाया . शाम को साढ़े पांच के बाद संभागियों को बैठना मुश्किल होता था पर आज सवा छः के बाद भी वे बच्चों की तरह क्रियाशील थे और सामग्री छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे. आखिर उन्हें ऐसा करने को कहा गया. शाम को रोजाना की तरह घूमने निकले आज रात बारिश आ गयी भोजन करने की इच्छा नहीं थी, नहीं किया. रात करीब ग्यारह बजे दूकान खुलवा कर भुजिया व बिस्कुट का पैकेट लिया.छत पर जाकर खाने लागे तो बारिश तेज़ हो गयी. नीचे आना पड़ा. हम हमारे कमरे में मस्ती कर रहे थे. गाने गा रहे थे. साढ़े बारह से ऊपर हो गए . इतने में पीछे वाली खिड़की से प्रशांत ने आकर शांत होने को कहा.
२४ मई ९७
रात की बारिश के बाद मौसम सुहाना हो रहा था. पर जैसे-जैसे दिन चढ़ा, गर्मी भी पीछे नहीं रही. आज गजराज के ग्रूप के लिए व्यायाम सत्र लेने को गजराज ने कल रात को मुझे कहा था. आज छत पर उनके ग्रूप के कुछ पुरुष और दो में से एक महिला संभागी आये. मैंने उन्हें एरोबिक्स और बिना डम्बल के डम्बल एक्सरसाइज करवाई. नाश्ते से पहले नहाने गया. १० बजे की चाय के बाद मैं ऊपर कमरे में चला गया ,वहां अभी तक प्राप्त पंजीयन प्रपत्रों का उपस्थिति पंजिका में लिखे नामों से मिलान किया दो तीन जन के नाम नहीं मिले तो उन्हें दूसरे ग्रूपों के पंजीयन पत्रों में तलाश किया. लंच टाइम के बाद कुछ देर विश्राम करके दलीप और मिथलेश के साथ इसी कार्य में लगा. शाम तक यह कार्य करके घूमने गए. वापस आने पर पता चला कि कल की बजाय आज ही विशेष भोजन दाल, बाटी और चूरमा है. पेट भर चूरमा ही खाया. बाटी सिर्फ एक. आज सांस्कृतिक संध्या का आयोजन था. रात करीब साढ़े बारह बजे तक ये कार्यक्रम चलता रहा
२५ मई ९७
सांस्कृतिक कार्यक्रम के चलते तारीख़ बदल गयी थी. लगभग एक बजा था. इतने में गजराज आया और बोला चल चाय बनाकर लाते हैं. नीचे रसोई से लगभग १० जनों के लिए [जो बैठे थे] चाय लेकर आये. हम थे शेखर, प्रशांत, गजराज, महमूद , कृष्ण , अनुराधा , सरस्वती , और उर्मिला इनके साथ मैं भी, गाने , गीत, ग़ज़ल, चुटकुलों का दौर शुरू हुआ तो ढाई बजे तक चलता रहा. अनुराधा तो बाद में गीत, ग़ज़ल सुन कर आई थी. आखिर सोये, सुबह साढ़े पांच ही आँख खुल गई. शौचादि से निवृत्त होकर आकर लेट गया . गजराज ने जगाया . बाहर जाकर चाय पी. कुछ देर छत पर प्रतीक्षा के बाद कोई संभागी नहीं आया तो दूर बाहर की ओर एक हैण्ड पम्प पर पहुंचे. गजराज ने अपनी व्यथा बताई. टी ए बिल्स वगैरह भरवाए गए. संधान की जीप से बांसखो फाटक आये वहां से घाटगेट के लिए बस पकड़ी. शाम को हनुमानगढ़ के लिए गाडी में भीड़ बहुत थी . शायद पहली बार ऐसा हुआ कि ट्रेन हनुमानगढ़ पहुँच गयी है और मैं सोया हुआ हूँ .गाडी गंगानगर के लिए रवाना होने से पहले जाग आई और मैं उतरा.
कुछ खास
दिन का सत्र चल रहा था. किसी जोशीले गीत पर पर ढोलक की थाप पर संभागी नाच रहे थे तो मंडोर से आये बुजुर्ग फ़ारूकी से न रहा गया और अपने छोटे कद लेकिन भारी भरकम शरीर को जुम्बिश में लाये तो नाचते-नाचते हांफ गए और आखिर धम्म से गिरते को दूसरे संभागियों ने फुर्ती से संभाला. पानी के छींटे मारे, कमीज़ ऊपर किया, पायजामे का नाड़ा ढीला किया, और कम से कम पांच लोग अपने कापी , रूमाल, गत्ता जो भी हाथ में थे से लगभग १० मिनट तक तब तक हवा करते रहे जब तक कि फ़ारूकी साहब सामान्य न हो गए.
मुक़द्दर शेख और गजराज ऊपर दूसरी मंज़िल पर टहल रहे थे कि एक बन्दर वहां आ गया गजराज ने उससे छेड़ खानी की हाथों के हाव भाव उसकी ओर करके, तो वह उनकी ओर लपका, गजराज तो भाग लिया पर शेख साहब का पाजामा उसने पकड़ लिया. तभी धर्मशाला में रहने वाले एक व्यक्ति ने उसे भगाया.
मैं और प्रियेश हमारे कमरा नंबर छः में बैठे थे. सामने बरामदे की दीवार पर रखे एक मटके पर रखे ढक्कन को हटा कर एक बन्दर उसमे पानी में झांक रहा था उसने पानी पीने वाली लुटिया भी नीचे गिरा दी. प्रियेश चिल्लाने लगा..अबे ..बन्दर...भाग...हट, तभी बन्दर लपका कमरे की ओर परन्तु मैं भाव शून्य सा बैठा रहा वहां से बन्दर तुरंत चला गया बाद में मुझे अहसास हुआ की संभवतः मेरे नहीं हिलने से बन्दर की अन्दर आने की हिम्मत नहीं हुई पर प्रियेश बन्दर के जाने के बाद भी कुछ देर तक कहता रहा...अरे कमरा बंद कर यार.
धर्मशाला के नहान घरों की छत पर एक बंदरिया ने बच्चा पैदा किया संभागियों के शोर मचाने पर वह तुरंत अपने बच्चे को ले गयी.
नई नाथ में जटाधारी एक सन्यासी थिएटर इन एडूकेशन की ट्रेनिंग के समय भी दिखाई देता था इस बार उनसे मिले तो अपना नाम परमेश्वर दास और बंगाल से बताया . पिछले बीस साल से यहीं रह रहे हैं केवल दूध ही पी रहे हैं पिछले सत्रह वर्षों से. बातचीत से बाबा बड़े सरल स्वभाव के लगे. कभी किसी से कुछ मांगते नहीं देखा, देखा तो आसपास के मंदिरों , धर्मशालाओं में घूमते. गायों की सेवा करते . कभी हमारे कमरों में भी आकर बैठ जाते बंदरों के बारे में उन्होंने बताया कि यहाँ धर्मशालाओं में कोई नहीं होता तो इन्ही का राज होता है. बाबा ने बताया कि यदि बन्दर से आँख न मिलाओ तो वे कुछ नहीं कहते .
विनोद यादव
१८ मई ९७ से २५ मई ९७
जयपुर, प्रातः जल्दी उठ कर तैयारी की . मासी का पूरा परिवार मनीषा की शादी के सिलसिले में साढ़े छः बजे रवाना हो गए . मैंने गरम रोटी बनाने के बजाय दही से दो ठंडी रोटियां खायी और करीब साढ़े सात बजे ताला लगाकर चाभियाँ पड़ोस में देकर निकल लिया . लोकल बस सेवा से घाट गेट और वहां से जीप द्वारा सवा नौ बजे बांसखो फाटक उतरा . वहां कुछ देर इंतज़ार के बाद 'जुगाड़' से बांसखो गाँव आया . कोई भी साथी नज़र नहीं आया तो पैदल ही नईनाथ की तरफ चला . गर्मी में तीन किलोमीटर से ज्यादा चल कर करीब सवा दस बजे श्री बलराम आश्रम पहुँचा तो पसीने से लथपथ हो चुका था . मुझ से पहले आ चुके थे प्रबोधक [बाद में पता चला ] मुक़द्दर मोहम्मद शेख जो सिरोड़ी [जिला सिरोही ] से हैं . कुछ पल तख्त पर बैठने के बाद दूसरी मंज़िल के एक कमरे में सामान रखा, गद्दा बिछाया , लेटा तो नींद आ गयी . करीब १२ बजे संधान से साथ आ गए जिनमे संजय, सुनील और प्रशांत थे . चाय के साथ तैयारी बैठक शुरू की गयी . सबसे पहले कमरों की नम्बरिंग की गयी . अन्य प्रबोधकों में चाँद मल थोड़ा देरी से थे जाहिद व शर्मा भी थे . तैयारी बैठक में निश्चित किया गया कि कल प्रतिभागियों के आने पर उन्हें अस्थायी व्यवस्था बताएँगे . .बातचीत में पता चला कि तेरह ब्लॉक बसेडी, लाडपुरा , खमनौर , जैसलमेर , मनोहरथाना, आबूरोड , कुशलगढ़ , बाड़मेर , बारां , बड़ी सादड़ी , कोटडा और गंगापुर से करीब दो सौ लोगों को बुलवाया गया है . और तब ही मुझे इस बात का भी पता चला कि मैं प्रशिक्षण लेने नहीं बल्कि देने वालों में से हूँ . गजराज भी दोपहर बाद आ चुका था . मैं गजराज और गोपाल छः नंबर कमरे में शिफ्ट हो गए . शाम को बाहर घूमने निकल पड़े . आज ही यह बात भी निश्चित कर ली गयी कि कल सामग्री वितरित की जाएगी जिसमे कापी, पेन , अभियान गीत , व कार्ड शीट आदि होंगे . परिचय में संभागी कार्ड शीट पर अपना नाम लिख कर कोई चित्र बनायेंगे . रात के खाने के बाद ही कमरे में आये एक बार तो छत पर सोने का मन किया पर फिर कमरे में ही सो गए .
१९ मई ९७
सबेरे साढ़े पांच बजे उठ गया . नज़दीक के एक ढाबे पर गजराज व गोपाल के साथ चाय पीने गया . इक्का -दुक्का संभागी तो कल रात को ही आ चुके थे . पर आज दोपहर तक ज़्यादातर लोग आ गए . इस से पहले दस बजे तक जितने भी संभागी आ गए थे उन्हें नीचे हाल में इकठ्ठा होने को कहा गया . सरस्वती वंदना से सत्र आरम्भ किया गया . राजेश भारद्वाज भी आ गए थे . संभागियों को पंजीयन प्रपत्र भरने को दिए . इसके बाद मेरे सुझाव के अनुसार मिश्रित ब्लॉक्स की ग्रूपिंग की गयी . ग्रूप बताने के बाद [ तब तक तीन ग्रूप बनाये गए थे] एक को वहीँ सेन्ट्रल हाल, दूसरे को ऊपरी मंज़िल के बड़े कमरे और तीसरे को जांगिड़ धर्मशाला पहुँचने को कहा गया . इसके बाद समूहगत गतिविधियाँ शुरू की गयी . संभागियों को कार्ड शीट देकर नाम लिख कर कोई भी चित्र बनाने और सीने पर लगाने को कहा गया . फिर राजेश ने नमस्ते रेलगाड़ी वाली गतिविधि अपनाई . नाम परिचय के बाद 'मामाजी ने लड्डू...' खेल खेला . करीब एक बजे प्रथम सत्र का अवसान किया गया . मेरा उपवास होने के कारण मैं चाय पीने सुबह वाली दूकान पर गया तो उसने मुझे गिलास धोने को कहा , मैंने कहा सुबह तो नहीं धोया था , फिर भी मैंने चाय पीकर गिलास धोकर पैसे दिए . कुछ देर आराम किया . तीन बजे फिर बुलाया गया था . डाक्टर राघव प्रकाश ने आमुखीकरण, अभिमुखीकरण, ६-१४ आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं की शिक्षा पर बताया. साढ़े पांच बजे संभागी फिर इकट्ठा हुए . संभागियों की संख्या बढ़ चुकी थी . एक और ग्रूप बना कर उनके लिए हरियाणा धर्मशाला नियत की गयी . सभी को उनके निवास व्यवस्था के बारे में बताया गया . चाय पीने बाहर निकल गए . नौ बजे तक छत पर लेटा रहा . रात्रि सत्र में गीत वगैरह के बाद कानाफूसी गतिविधि की गयी. भजन आदि के बाद ' होंगे कामयाब ...' से समापन किया गया . करीब ग्यारह बजे शेखर, कृष्णावतार , कोर ग्रूप मीटिंग करने हमारे कमरे में आये . हाल में मुझे शेखर ने कल हरियाणा धर्मशाला वाले ग्रूप में जाने को बोला था अब कोर ग्रूप में बोला कि नहीं जाना है .
२० मई ९७
सुबह सवा पांच बजे उठा तब भी शौचालय बुक थे , सो जंगल गया . लौटकर नहाने के लिए इधर-उधर घूम कर मीणा धर्मशाला की टोंटी तलाश की . गजराज के साथ वहां नहाकर आया . व्यायाम सत्र कृष्णावतार ने कराया . कल का कार्य अंजू को सौंपा गया . नाश्ते के बाद साढ़े आठ बजे फिर से हाल में आये . खमनौर से सुखमणि सैनी और कोटा से उमेश करके दो संभागी आज आये . तू ही राम से प्रार्थना सत्र शुरू किया गया . दोहा वाचन किया गया . आज का दोहा..."तुलसी इस संसार..."पर चर्चा, अर्थ और व्याख्या की . एक्शन सॉंग "चार पैसे होते..." कराया गया .समूह ने भित्ति पत्रिका और प्रतिवेदन प्रस्तुत किया . कोई भी वाद या परंपरा किस तरह शुरू हो जाती है...पर शेखर ने कहानी सुनाई. जिसका सार यह था कि किस प्रकार किसी आश्रम में हवन करते हुए पालतू बिल्ली उछल कूद , तोड़-फोड़ करती तो उसे बांधना शुरू कर दिया . कालांतर में बिल्ली नहीं होते हुए भी हवन के समय कहीं से बिल्ली लाकर बांधी जाने लगी . एक संभागी ने कहावत बताई " गैले-गैले चाल , भले ही बेर लागे "साक्षरता गीत .."मै तो पढवा जाऊं " गंगापुर की त्रिमूर्ति [ वहां के सुभाष नकड़ा, कुमेर लाल और उमेश एक साथ बैठते थे ] ने सुनाया . ताम झाम सा, मोटा सोटा और चूहों म्याऊ सो रही वाले क्रिया गीत करवाए. इसके बाद "शिक्षा क्या व क्यों ?" में प्राथमिक शिक्षा की वर्तमान स्थिति पर चर्चा करवाई गयी . फिर उसे कार्ड शीट पर लिखने को कहा गया समस्याओं पर राजनीतिक हस्तक्षेप , अभिभावकों का असहयोग , बोझिल पाठ्यक्रम और शिक्षकों को अन्य कार्यों में लगाने पर ज्यादा ज़ोर था .इसके बाद पोस्चर पासिंग और क्लैप पासिंग का खेल कराया . इसके बाद पहचान गतिविधि करवाई गयी .इसमें सभी का मुंह दीवारों की तरफ करवाकर एक को बीच में कपड़ा ओढ़ाकर मिसिंग पर्सन को पहचानना था कोई भी न पहचान पाया तो कपड़ा ही हटाया गया. विद्यालयों की स्थिति आदर्श नहीं बन पाना पर चर्चा में पिछले बिन्दुओं की ही पुनरावृत्ति हुई . सभी को लोक जुम्बिश -एक परिचय पुस्तिका वितरित की गयी. कुछ परिचय शेखर ने दिया.क्रिया गीत कराया गया. रात्रि सत्र में भाटी को डायलोग डिलीवरी का बोला गया . जैमिनी ने ४ को प्रत्येक बार ४ बार इस्तेमाल करके ० से १० तक की संख्या निकलने की टास्क दी गयी . तोता कहानी पढने को कहा गया . इस पर विचार मंथन को व विचार रखने को कहा गया .हमारे निवास कमरा नम्बर छः में ही कोर मीटिंग हुई .
21 मई ९७
सुबह उठने के बाद नहा धो कर ही साढ़े छः बजे के व्यायाम सत्र में आ गया. अंजू नकड़ा ने आज व्यायाम करवाया . नाश्ते के बाद फिर इकट्ठा हुए तो गीत भजन के बाद दोहा वाचन पर चर्चा हुई . १० बजे की चाय के बाद टास्क रिपोर्टिंग में १९ और २० की गतिविधियों का प्रतिवेदन तैयार करना था इस को अलग -अलग भागों में बांटा गया था . दो दिन में क्या हुआ, सत्र कौन से थे , क्या करवाया , उद्देश्य क्या थे ? किस सामग्री का प्रयोग किया गया . तीन बाते जो अच्छी लगी , कमियां क्या लगी ?सुधार के लिए क्या सुझाव ? प्रशिक्षण अवधि के कम होने की शिकायत , संभागियों की अधिक संख्या से परेशानी, भोजन अवकाश के बाद " घोड़े ओ घोड़े..." क्रिया गीत करवाया . सम्प्रेषण की गतिविधि के बारे में बताया गया. इसमें काल्पनिक गेंद तथा उलट पलट वाली गतिविधि करवाई.सम्प्रेषण के बारे में बताया गया कि शाब्दिक हाव भाव , आँखों द्वारा स्पर्श, तथा लिखित प्रकार हो सकते हैं . प्राथमिक शिक्षा में सम्प्रेषण संकट के कारण शिक्षक के सन्दर्भ में उच्चारण स्पष्ट न होना, कक्षा में अधिक शोर, स्तरीय भाषा का प्रयोग न होना, शिक्षक व विद्यार्थी में शारीरिक व भावनात्मक दूरी. बच्चे के सन्दर्भ में उसका मंदबुद्धि होना, बुद्धिलब्धि समान न होना, बालक का मानसिक रूप से कक्षा में अनुपस्थित होना. भाटी ने इसके बाद तेज़ चला कर" ५० किलोमीटर का सफ़र" करवाया . सभी थकान के बाद लेट गए शव आसन की मुद्रा में . तन्द्रा में भाटी ने पिता का पुत्र के नाम पत्र पढ़ कर सुनाया. सभी स्वाभाविक रूप से सम्मोहन की स्थिति में थे. सभी को उनके बचपन की ओर लौट जाने और उसकी याद में खो जाने को कहा गया. सत्र समाप्ति के बाद बाहर चाय के लिए गए . लौटकर खाना खाया और रात्रि सत्र में गीत भजन के बाद हाव भाव प्रकट करते हुए अपना नाम बताने को कहा गया. इसके बाद सुख, दुःख, डर , क्रोध फॉर कोर्नर गेम कराया. फिर चार बास का गेम करवाया. जिसमे चार बासों [मोहल्लो] एक योजना बताई जिसमे नीम और आम के पेड़ लगाने थे.कोर ग्रूप की मीटिंग रात साढ़े ग्यारह बजे तक चलती रही.
२२ मई ९७
आज प्रातः उठ कर नहाने के लिए मीणा धर्मशाला गए तो वहां पहले से ही काफी भीड़ थी.क्योंकि एक तो आज पूर्णमासी थी और दूसरी बात आज पांचाल ब्राह्मण समाज की ओर से सामूहिक विवाह का आयोजन था. इसलिए नहाने के लिए दूर के एक नल पर जाना पड़ा. व्यायाम सत्र सुनील द्वारा योग क्रियाओं के ज़रिये संपन्न हुआ . नाश्ते के बाद प्रार्थना सत्र में अबू रोड से आई महिला संभागियों ने नई प्रार्थना गाई. संभागियों को "तोता कहे सो कर खेल करवाया गया.मिरर गेम कराया. ट्रस्ट गेम कराया. भोजन अवकाश के बाद नाटक क्या है ? पर चर्चा की गयी. नाटक औपचारिक व अनौपचारिक हो सकते हैं.अध्यापन में नाट्य का प्रयोग कैसे किया जा सकता है पर चर्चा की गयी. इसके बाद शिक्षा , कल आज और कल पर तीन अलग ग्रूपों को नाट्य प्रस्तुति करने को कहा गया. आज कोर मीटिंग नीचे हाल में ही हुई. रात्रि सत्र के बाद ऊपर कमरे में हंसी मजाक चल रहा था कि करीब एक बजे एक सांड ऊपर चढ़ आया और सोते से जाग गए संभागियों के शोर मचने से घबरा गया और दूसरी मंज़िल पर भागने दौड़ने लगा. कुछ देर बाद सीढ़ियाँ उतरा तो सभी ने राहत की सांस ली. दोपहर के भोजन में आज दाल बाटी और चूरमा था.
२३ मई ९७
आज के सत्र में चर्चा थी कि क्या परम्पराओं में या मान्यताओं में कोई वैज्ञानिक तर्क होता है ? लंच के बाद गुटर गूं क्रिया गीत करवाया गया. स्त्री-पुरुष संबंधों पर चर्चा की गयी. शाम को विभिन्न सामग्री रंग स्याही, मोमबत्ती, अखबार के टुकड़े , धागे आदि देकर सृजन शीलता करवाई गयी. एक बुजुर्ग संभागी भंवर लाल जो चित्रकला में एम ए थे , ने अलग डिज़ाइन बनाया . शाम को साढ़े पांच के बाद संभागियों को बैठना मुश्किल होता था पर आज सवा छः के बाद भी वे बच्चों की तरह क्रियाशील थे और सामग्री छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे. आखिर उन्हें ऐसा करने को कहा गया. शाम को रोजाना की तरह घूमने निकले आज रात बारिश आ गयी भोजन करने की इच्छा नहीं थी, नहीं किया. रात करीब ग्यारह बजे दूकान खुलवा कर भुजिया व बिस्कुट का पैकेट लिया.छत पर जाकर खाने लागे तो बारिश तेज़ हो गयी. नीचे आना पड़ा. हम हमारे कमरे में मस्ती कर रहे थे. गाने गा रहे थे. साढ़े बारह से ऊपर हो गए . इतने में पीछे वाली खिड़की से प्रशांत ने आकर शांत होने को कहा.
२४ मई ९७
रात की बारिश के बाद मौसम सुहाना हो रहा था. पर जैसे-जैसे दिन चढ़ा, गर्मी भी पीछे नहीं रही. आज गजराज के ग्रूप के लिए व्यायाम सत्र लेने को गजराज ने कल रात को मुझे कहा था. आज छत पर उनके ग्रूप के कुछ पुरुष और दो में से एक महिला संभागी आये. मैंने उन्हें एरोबिक्स और बिना डम्बल के डम्बल एक्सरसाइज करवाई. नाश्ते से पहले नहाने गया. १० बजे की चाय के बाद मैं ऊपर कमरे में चला गया ,वहां अभी तक प्राप्त पंजीयन प्रपत्रों का उपस्थिति पंजिका में लिखे नामों से मिलान किया दो तीन जन के नाम नहीं मिले तो उन्हें दूसरे ग्रूपों के पंजीयन पत्रों में तलाश किया. लंच टाइम के बाद कुछ देर विश्राम करके दलीप और मिथलेश के साथ इसी कार्य में लगा. शाम तक यह कार्य करके घूमने गए. वापस आने पर पता चला कि कल की बजाय आज ही विशेष भोजन दाल, बाटी और चूरमा है. पेट भर चूरमा ही खाया. बाटी सिर्फ एक. आज सांस्कृतिक संध्या का आयोजन था. रात करीब साढ़े बारह बजे तक ये कार्यक्रम चलता रहा
२५ मई ९७
सांस्कृतिक कार्यक्रम के चलते तारीख़ बदल गयी थी. लगभग एक बजा था. इतने में गजराज आया और बोला चल चाय बनाकर लाते हैं. नीचे रसोई से लगभग १० जनों के लिए [जो बैठे थे] चाय लेकर आये. हम थे शेखर, प्रशांत, गजराज, महमूद , कृष्ण , अनुराधा , सरस्वती , और उर्मिला इनके साथ मैं भी, गाने , गीत, ग़ज़ल, चुटकुलों का दौर शुरू हुआ तो ढाई बजे तक चलता रहा. अनुराधा तो बाद में गीत, ग़ज़ल सुन कर आई थी. आखिर सोये, सुबह साढ़े पांच ही आँख खुल गई. शौचादि से निवृत्त होकर आकर लेट गया . गजराज ने जगाया . बाहर जाकर चाय पी. कुछ देर छत पर प्रतीक्षा के बाद कोई संभागी नहीं आया तो दूर बाहर की ओर एक हैण्ड पम्प पर पहुंचे. गजराज ने अपनी व्यथा बताई. टी ए बिल्स वगैरह भरवाए गए. संधान की जीप से बांसखो फाटक आये वहां से घाटगेट के लिए बस पकड़ी. शाम को हनुमानगढ़ के लिए गाडी में भीड़ बहुत थी . शायद पहली बार ऐसा हुआ कि ट्रेन हनुमानगढ़ पहुँच गयी है और मैं सोया हुआ हूँ .गाडी गंगानगर के लिए रवाना होने से पहले जाग आई और मैं उतरा.
कुछ खास
दिन का सत्र चल रहा था. किसी जोशीले गीत पर पर ढोलक की थाप पर संभागी नाच रहे थे तो मंडोर से आये बुजुर्ग फ़ारूकी से न रहा गया और अपने छोटे कद लेकिन भारी भरकम शरीर को जुम्बिश में लाये तो नाचते-नाचते हांफ गए और आखिर धम्म से गिरते को दूसरे संभागियों ने फुर्ती से संभाला. पानी के छींटे मारे, कमीज़ ऊपर किया, पायजामे का नाड़ा ढीला किया, और कम से कम पांच लोग अपने कापी , रूमाल, गत्ता जो भी हाथ में थे से लगभग १० मिनट तक तब तक हवा करते रहे जब तक कि फ़ारूकी साहब सामान्य न हो गए.
मुक़द्दर शेख और गजराज ऊपर दूसरी मंज़िल पर टहल रहे थे कि एक बन्दर वहां आ गया गजराज ने उससे छेड़ खानी की हाथों के हाव भाव उसकी ओर करके, तो वह उनकी ओर लपका, गजराज तो भाग लिया पर शेख साहब का पाजामा उसने पकड़ लिया. तभी धर्मशाला में रहने वाले एक व्यक्ति ने उसे भगाया.
मैं और प्रियेश हमारे कमरा नंबर छः में बैठे थे. सामने बरामदे की दीवार पर रखे एक मटके पर रखे ढक्कन को हटा कर एक बन्दर उसमे पानी में झांक रहा था उसने पानी पीने वाली लुटिया भी नीचे गिरा दी. प्रियेश चिल्लाने लगा..अबे ..बन्दर...भाग...हट, तभी बन्दर लपका कमरे की ओर परन्तु मैं भाव शून्य सा बैठा रहा वहां से बन्दर तुरंत चला गया बाद में मुझे अहसास हुआ की संभवतः मेरे नहीं हिलने से बन्दर की अन्दर आने की हिम्मत नहीं हुई पर प्रियेश बन्दर के जाने के बाद भी कुछ देर तक कहता रहा...अरे कमरा बंद कर यार.
धर्मशाला के नहान घरों की छत पर एक बंदरिया ने बच्चा पैदा किया संभागियों के शोर मचाने पर वह तुरंत अपने बच्चे को ले गयी.
नई नाथ में जटाधारी एक सन्यासी थिएटर इन एडूकेशन की ट्रेनिंग के समय भी दिखाई देता था इस बार उनसे मिले तो अपना नाम परमेश्वर दास और बंगाल से बताया . पिछले बीस साल से यहीं रह रहे हैं केवल दूध ही पी रहे हैं पिछले सत्रह वर्षों से. बातचीत से बाबा बड़े सरल स्वभाव के लगे. कभी किसी से कुछ मांगते नहीं देखा, देखा तो आसपास के मंदिरों , धर्मशालाओं में घूमते. गायों की सेवा करते . कभी हमारे कमरों में भी आकर बैठ जाते बंदरों के बारे में उन्होंने बताया कि यहाँ धर्मशालाओं में कोई नहीं होता तो इन्ही का राज होता है. बाबा ने बताया कि यदि बन्दर से आँख न मिलाओ तो वे कुछ नहीं कहते .
विनोद यादव
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