त्रिदिवसीय शिक्षक नाट्य कार्यशाला, झालरापाटन [झालावाड]
२१ नवम्बर ९६ कोटा मे ट्रेन से उतर कर चाय पीने के बाद बस अड्डे नयापुरा पहुंचा . वहाँ से झालरापाटन के लिए बस पकडी . करीब पौने दस बजे थे . लोक जुम्बिश परियोजना कार्यालय मे सहायक परियोजना अधिकारी आशुतोष गौतम से बातचीत हुई . वहीं एक कमरे मे सामान छोड़ा . नहाने के लिए पानी का पूछा पर निराशा ही हाथ लगी . पीने के लिए घड़ों मे रखे पानी से नहाने का प्रस्ताव रखा गया जो मुझे मन्जूर नही था .दोपहर बाद गोपाल लाल मीना एक ढाबे पर मुझे खाने के लिए लिवा ले गए . आकर् लेटा तो झपकी आ गई .उठा तो दुर्गाशंकर सोनी को वहाँ बैठे और वहाँ उपस्थित किसी अन्य जन से चर्चा करते पाया . शाम ५-40 पर संजय अग्रवाल, गोपाल सिंह और दीन दयाल वहाँ पहुँच गए थे . सारा दिन उनका इन्तजार करते मन मे शंका पैदा हो रही थी . तीनों ने लेट हो जाने के अपने-अपने कारण बताए . संजय डिप्रेस्स्ड नज़र आ रह था . बार-बार की बातचीत से लग रहा था कि वह कैम्प संचालित कर सकने के बारे मे आश्वस्त नही था . संयोजक महोदय बार-बार मीटिंग करने की बात पर जोर दिए जा रहे थे . आखिर दीन दयाल भी जब मेरी तरह भर गया तो हमने इशारा किया और बाहर चले आए .रात को खाना खाने के लिए शहर के बीचो-बीच बाजार मे एक होटल पर गए . वापसी मे गौतम का घर मोटर साइकिल छोड्ने गया . वापसी मे तीनों को नही पाया तो अकेला ही परियोजना कार्यालय पहुंचा . कुछ देर बाद वे आए . फिर से बैठक हुई . एक बार फिर से कल क्या करना है पर चर्चा हुई . पंचायत समिति सभा भवन देखा .
२२ नवम्बर ९६
प्रातः कालीन सत्र के लिए हम तैयार होकर दस बजे सभा भवन पहुँचे . परन्तु शिक्षकगण ग्यारह बजे आना शुरु हुए . कुछ लोगों के आने के बाद सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम शुरु हुआ . देशभक्ति गान हुआ . अन्दर हाल मे ही विचरण करनाशुरु करवाया परन्तु आँखों से परिचय मे महिला सम्भागी असहजता अनुभव कर रही प्रतीत होती थी . शारीरिक गतिविधियाँ शुरु करवायी तो शिक्षक जगह की कमी बताने लगे . उन्हे भवन के बाहर फिर छत पर ले गए . जिसे पहले ही देख कर वहाँ कुछ सफाई करवा ली थी . वहाँ भी महिला सम्भागी एक ओर मुंडेर पर बैठ गयीं .यहाँ उनकी परेशानी यह थी कि आस पास के मकानों के लोग उन्हे गतिविधियाँ करते देख लेंगे सो फिर नीचे आ गए . नीचे आकर् ज्ञात हुआ कि संजय ने प्रस्ताव रखा कि इस कैम्प को यहीं समाप्त कर दिया जाए . हम इसके लिए तैयार नही थे . हम चाह रहे थे कि संजय व्यक्तिगत कारणों से नही रहना चाह रहा है तो वह अगर चला जाए तो शायद हम खुल् कर अपना कार्य कर सकेंगे क्योंकि कोई भी कार्य शुरु करने से पहले उसका मश्वरा आ जाता..ऐसे नही वैसे...? नीचे हाल मे फिर से आकर बैठने के बाद नाम को उल्टे क्रम मे बोल कर परिचय की शुरुआत हुई. कुछ ने बताया , यह जारी था कि कृष्ण मुरारी से क्रम टूट गया . उन्से छात्रों से जुड़े संस्मरण सुने . भोजन अवकाश के बाद गीत से सत्र को शुरु किया . बातचीत कि गई तो महिला सम्भागी जिनमे से एक तो स्वेटर बुनने मे व्यस्त थी और शायद घर से सोच कर आई थी कि न खुद कुछ करना है न दूसरियों को कुछ करने देना है . सुझाव था कि महिला सम्भागियों का समूह अलग बनाया जाए . नाच-गान की ट्रेनिंग मानने का भ्रम ! पुरुषों के सामने कोई भी गतिविधि करने मे [की] झिझक . बैठ कर नाम पासिंग, क्लैप पासिंग , स्टोरी मेकिंग ,सेल्फ एक्सप्रेसन का अभ्यास करवाया गया . इसके तत्काल बाद नाटक क्यों ? पर चर्चा की गई . इसमे लगभग सभी बातें लाने का प्रयास किया गया . रात्रि सत्र मे गीतों की शुरुआत की ही गई थी कि धीरे-धीरे सम्भागी खिसकना शुरु हो गए .
२३ नवम्बर ९६
सभी प्रति भागियों को आठ बजे बुलवाया गया था .लगभग नौ बजे तक सभी आ गए . भजन से सत्र की शुरुआत की गई . इसके बाद प्राणायाम की क्रियायें करवा कर शवासन करवाया . शरीर के विभिन्न अंगों मे तनाव और विश्राम की क्रिया करवायी . ध्यान करवाया ,कुछ मानो सो गए थे . लगभग सम्मोहन की स्थिति मे पहुंचाने के बाद उनसे उनके जीवन मे घटी उस समय याद आने वाली घटना के बारे मे वर्णन करने को कहा गया . एक-एक करके वास्तव मे महत्वपूर्ण लाग्ने वली घत्नाएं सुनने को मिली पर एक रमेश चन्द्र ज्यादा भावुक लगे . बोले " आप सुन नही पाओगे " और उनकी आँखे छल -छला आयिन . उनसे अगले गुरुजी को सुना . सारी स्थिति का आकलन करने पर महसूस हुआ और अच्छा लगा की हमने सम्भागियों की संवेदनाएं जगा दी हैं . महिला सम्भागी समेत अधिकांश समूह को लग रहा है कि वे कुछ नया कर रहे है . भोजन अवकाश के बाद के सत्र मे फ्लावर प्रेजेंटेशन, स्लिप मे लिखी सिचुएशन एक्ट करना , फीलिंग एक्सरसाइज, स्टिल इमेजेस , दी गई स्थिति पर एक्ट करना [समूह मे] , फोर कोर्नर गेम ,मिरर एक्सरसाइज, ज़िब्रिश लेंग्वेज़, टू इन वन का प्रदर्शन किया व करवाया . रात्रि कालीन सत्र मे गीत नाच किया .
२४ नवम्बर ९६
आज साढे आठ बजे एरोबिक्स की गई . जल्दी ही शरीर के पसीज जाने की प्रति क्रिया आई " आज कसरत का मजा आया है " टी ब्रेक के बाद गीतों से शुरुआत हुई . इसी दौरान कार्यशाला मे ही लिखा गया गीत 'जुम्बिश थारो मजो घणों आयो..." गया . दिए गए शीर्षकों से शीट राइटिंग करवाई . बच्चों के विभिन्न आयु वर्गों के अनुसार सहज स्वाभाविक क्रियायें करने की कोशिश, ट्रस्ट गेम ,नम्बर गेम , कराया . अन्त मे नाट्य गतिविधियों का प्रयोग करते हुए किस प्रकार किया जा सकता है . उनसे करवाकर देखा भी गया . खाना खाने बैठे . हम नाट्य प्रशिक्षक ही टी ए बिल्स भरने व भुगतान लेने के कारण ही लेट हुए . झालरापाटन से रवाना होकर झालावाड सोनी जी के घर हो आए . वहाँ से लौट कर कौशिक कुमार द्वारा की गई आवभगत का आनन्द लिया . वे कोटा के लिए बस तक के लिए हमे छोड्ने बस अड्डे भी पहुँचे .
२१ नवम्बर ९६ कोटा मे ट्रेन से उतर कर चाय पीने के बाद बस अड्डे नयापुरा पहुंचा . वहाँ से झालरापाटन के लिए बस पकडी . करीब पौने दस बजे थे . लोक जुम्बिश परियोजना कार्यालय मे सहायक परियोजना अधिकारी आशुतोष गौतम से बातचीत हुई . वहीं एक कमरे मे सामान छोड़ा . नहाने के लिए पानी का पूछा पर निराशा ही हाथ लगी . पीने के लिए घड़ों मे रखे पानी से नहाने का प्रस्ताव रखा गया जो मुझे मन्जूर नही था .दोपहर बाद गोपाल लाल मीना एक ढाबे पर मुझे खाने के लिए लिवा ले गए . आकर् लेटा तो झपकी आ गई .उठा तो दुर्गाशंकर सोनी को वहाँ बैठे और वहाँ उपस्थित किसी अन्य जन से चर्चा करते पाया . शाम ५-40 पर संजय अग्रवाल, गोपाल सिंह और दीन दयाल वहाँ पहुँच गए थे . सारा दिन उनका इन्तजार करते मन मे शंका पैदा हो रही थी . तीनों ने लेट हो जाने के अपने-अपने कारण बताए . संजय डिप्रेस्स्ड नज़र आ रह था . बार-बार की बातचीत से लग रहा था कि वह कैम्प संचालित कर सकने के बारे मे आश्वस्त नही था . संयोजक महोदय बार-बार मीटिंग करने की बात पर जोर दिए जा रहे थे . आखिर दीन दयाल भी जब मेरी तरह भर गया तो हमने इशारा किया और बाहर चले आए .रात को खाना खाने के लिए शहर के बीचो-बीच बाजार मे एक होटल पर गए . वापसी मे गौतम का घर मोटर साइकिल छोड्ने गया . वापसी मे तीनों को नही पाया तो अकेला ही परियोजना कार्यालय पहुंचा . कुछ देर बाद वे आए . फिर से बैठक हुई . एक बार फिर से कल क्या करना है पर चर्चा हुई . पंचायत समिति सभा भवन देखा .
२२ नवम्बर ९६
प्रातः कालीन सत्र के लिए हम तैयार होकर दस बजे सभा भवन पहुँचे . परन्तु शिक्षकगण ग्यारह बजे आना शुरु हुए . कुछ लोगों के आने के बाद सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम शुरु हुआ . देशभक्ति गान हुआ . अन्दर हाल मे ही विचरण करनाशुरु करवाया परन्तु आँखों से परिचय मे महिला सम्भागी असहजता अनुभव कर रही प्रतीत होती थी . शारीरिक गतिविधियाँ शुरु करवायी तो शिक्षक जगह की कमी बताने लगे . उन्हे भवन के बाहर फिर छत पर ले गए . जिसे पहले ही देख कर वहाँ कुछ सफाई करवा ली थी . वहाँ भी महिला सम्भागी एक ओर मुंडेर पर बैठ गयीं .यहाँ उनकी परेशानी यह थी कि आस पास के मकानों के लोग उन्हे गतिविधियाँ करते देख लेंगे सो फिर नीचे आ गए . नीचे आकर् ज्ञात हुआ कि संजय ने प्रस्ताव रखा कि इस कैम्प को यहीं समाप्त कर दिया जाए . हम इसके लिए तैयार नही थे . हम चाह रहे थे कि संजय व्यक्तिगत कारणों से नही रहना चाह रहा है तो वह अगर चला जाए तो शायद हम खुल् कर अपना कार्य कर सकेंगे क्योंकि कोई भी कार्य शुरु करने से पहले उसका मश्वरा आ जाता..ऐसे नही वैसे...? नीचे हाल मे फिर से आकर बैठने के बाद नाम को उल्टे क्रम मे बोल कर परिचय की शुरुआत हुई. कुछ ने बताया , यह जारी था कि कृष्ण मुरारी से क्रम टूट गया . उन्से छात्रों से जुड़े संस्मरण सुने . भोजन अवकाश के बाद गीत से सत्र को शुरु किया . बातचीत कि गई तो महिला सम्भागी जिनमे से एक तो स्वेटर बुनने मे व्यस्त थी और शायद घर से सोच कर आई थी कि न खुद कुछ करना है न दूसरियों को कुछ करने देना है . सुझाव था कि महिला सम्भागियों का समूह अलग बनाया जाए . नाच-गान की ट्रेनिंग मानने का भ्रम ! पुरुषों के सामने कोई भी गतिविधि करने मे [की] झिझक . बैठ कर नाम पासिंग, क्लैप पासिंग , स्टोरी मेकिंग ,सेल्फ एक्सप्रेसन का अभ्यास करवाया गया . इसके तत्काल बाद नाटक क्यों ? पर चर्चा की गई . इसमे लगभग सभी बातें लाने का प्रयास किया गया . रात्रि सत्र मे गीतों की शुरुआत की ही गई थी कि धीरे-धीरे सम्भागी खिसकना शुरु हो गए .
२३ नवम्बर ९६
सभी प्रति भागियों को आठ बजे बुलवाया गया था .लगभग नौ बजे तक सभी आ गए . भजन से सत्र की शुरुआत की गई . इसके बाद प्राणायाम की क्रियायें करवा कर शवासन करवाया . शरीर के विभिन्न अंगों मे तनाव और विश्राम की क्रिया करवायी . ध्यान करवाया ,कुछ मानो सो गए थे . लगभग सम्मोहन की स्थिति मे पहुंचाने के बाद उनसे उनके जीवन मे घटी उस समय याद आने वाली घटना के बारे मे वर्णन करने को कहा गया . एक-एक करके वास्तव मे महत्वपूर्ण लाग्ने वली घत्नाएं सुनने को मिली पर एक रमेश चन्द्र ज्यादा भावुक लगे . बोले " आप सुन नही पाओगे " और उनकी आँखे छल -छला आयिन . उनसे अगले गुरुजी को सुना . सारी स्थिति का आकलन करने पर महसूस हुआ और अच्छा लगा की हमने सम्भागियों की संवेदनाएं जगा दी हैं . महिला सम्भागी समेत अधिकांश समूह को लग रहा है कि वे कुछ नया कर रहे है . भोजन अवकाश के बाद के सत्र मे फ्लावर प्रेजेंटेशन, स्लिप मे लिखी सिचुएशन एक्ट करना , फीलिंग एक्सरसाइज, स्टिल इमेजेस , दी गई स्थिति पर एक्ट करना [समूह मे] , फोर कोर्नर गेम ,मिरर एक्सरसाइज, ज़िब्रिश लेंग्वेज़, टू इन वन का प्रदर्शन किया व करवाया . रात्रि कालीन सत्र मे गीत नाच किया .
२४ नवम्बर ९६
आज साढे आठ बजे एरोबिक्स की गई . जल्दी ही शरीर के पसीज जाने की प्रति क्रिया आई " आज कसरत का मजा आया है " टी ब्रेक के बाद गीतों से शुरुआत हुई . इसी दौरान कार्यशाला मे ही लिखा गया गीत 'जुम्बिश थारो मजो घणों आयो..." गया . दिए गए शीर्षकों से शीट राइटिंग करवाई . बच्चों के विभिन्न आयु वर्गों के अनुसार सहज स्वाभाविक क्रियायें करने की कोशिश, ट्रस्ट गेम ,नम्बर गेम , कराया . अन्त मे नाट्य गतिविधियों का प्रयोग करते हुए किस प्रकार किया जा सकता है . उनसे करवाकर देखा भी गया . खाना खाने बैठे . हम नाट्य प्रशिक्षक ही टी ए बिल्स भरने व भुगतान लेने के कारण ही लेट हुए . झालरापाटन से रवाना होकर झालावाड सोनी जी के घर हो आए . वहाँ से लौट कर कौशिक कुमार द्वारा की गई आवभगत का आनन्द लिया . वे कोटा के लिए बस तक के लिए हमे छोड्ने बस अड्डे भी पहुँचे .
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