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yadavinod

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गुरुवार, 4 नवंबर 2010

नई सुबह

ये इक नई सुबह
ये शीतल बयार
ये गुनगुनी धूप
कि चाय की
प्याली से उठती
भाप भी
भली लगे
लगता है
अन  इच्छित
छूट गया है
पीछे कहीं
और आज सब
कुछ
मनवांछित होगा
यही आस और
विश्वास
जीवन से लगाव
पैदा करता है
कि मृत्यु अभी तुम
प्रतीक्षा करो
कि मुझे अभी
थोडा और जीना है

1 टिप्पणी:

Amrita Tanmay ने कहा…

हाँ ! विनोद जी , नयी सुबह की प्रतीक्षा हम सबों को होती है . बहुत सही कहा ......... शुभकामना ..