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मंगलवार, 15 जून 2010

PRATHMIK VIDYALYA ME SHIKSHAN ME NATYA VIDHA KA PRAYOG

प्राथमिक विद्यालय में शिक्षण में नाट्य विधा का  प्रयोग
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय ,चैनपुरा ,पंचायत समिति , पीसांगन [अजमेर]

को ओर्डीनेटर -राजेश भारद्वाज    
नाट्य प्रशिक्षक- राजेंद्र शर्मा
                    -हरीश शर्मा
                    -विनोद कुमार यादव [स्वयं]

मंगलवार ७-१-९७
सुबह नौ बजे सिन्धी कंप बस अड्डे पर पहुँच गया था | कुछ देर बाद हरीश और राजेंद्र भी नज़र आए | राजेश भाई का इंतजार करते-करते करीब एक घंटा हो गया था | इसी बीच बस स्टैंड पर एक दुर्घटना घटित हो गयी थी |  एक  लगभग पांच  वर्षीय बालक बस के नीचे कुचला गया था |मौके पर ही उसकी मौत हो गयी थी  | मन काफी भारी हो आया था | अजमेर के लिए बस में बैठे तो १०-२० हो रहे थे | लगभग एक बजे अजमेर में थे | पूछताछ से पीसांगन के लिए बस के लिए पता किया तो ०१-३० का बताया | चाय पीकर वापस अड्डे ०१-२० पर आए  तो पता लगा कि ०१-३० वाली बस जा चुकी है | अगली बस के लिए ३ बजे तक इंतजार करना पड़ा | सायं ०४-५५ पर पीसांगन पहुंचे | पंचायत परिसर में ही लोक जुम्बिश कार्यालय है | वहां प्रिंस सलीम परियोजना अधिकारी मौजूद थे | उनसे मुलाक़ात हुई | सलीम काफी दिलचस्प व्यक्ति महसूस हुए | बाद में तिलकराज से मिले जो यहाँ सहायक पी ओ हैं | सवा सात तक बात हुई | बातचीत से जुम्बिश के कार्यों के परिणाम के प्रति तिलकराज की खीझ प्रकट हुई | उनके विचार थे की जो कार्य चल रहे थे  या हैं उनका क्रियांवयन ही ठीक तरह से नहीं हो रहा है और संधान  नए -नए कार्यक्रम थोपे  जा रहा है|  उनकी बातचीत से लगा  कि उनको कान नहीं मिले वे अपने बारे में ज्यादा बताना  चाह रहे थे  | जैसे  एम्  एस  सी में ७२ पर्सेंट, सेकण्ड ग्रेड टीचर ,लोक जुम्बिश बजट की, एच आर डी में डिप्लोमा , बचत करने में क्रियाशील प्रोग्राम मोडयूल बनाने में दक्ष  आदि बातें | बाहर निकलते-निकलते ०७-३० हो गए | तभी वहां से पी ओ को भी निकलते देखा | हमें देखकर वे भी रुके | उनके निकलते ही तिलकराज बोले 'अब साढ़े सात तक ऑफिस में रुके रहे , यहाँ पांच बजे बाद नहीं रुकना चाहिए| हां ,फील्ड में घूमना हो ,काम करना हो तो अलग बात है | मैं बोला सभी का काम करने का अपना अलग ढंग होता  है | अरे ये क्या ढंग हुआ जिसमे सभी परेशान हो जाये | तो आपकी परेशानी उन तक पहुंची ही नहीं होगी | तभी एक अन्य ए पी ओ सत्यवीर यादव आ पहुंचे | वे भी बोले लोक जुम्बिश , संधान सब नाटक है | एक छोटा ,एक बड़ा | आपका स्वागत है, लेकिन नाटक को बगल में रख के | वहां से सीधे ही पहाडिया विश्रांति गृह पहुंचे | सामान रख कर रजाई , गद्दे वगैरह रखवाये | जुम्बिश कार्यालय में कार्यरत विनोद जी के साथ हरीश की बात कथित रूप से ढाबे वाले से हो चुकी थी ...गणेश भोजन  आलय | इसलिए खाने के  लिए वहां पहुंचे | भोजन के बाद 'चलें ' बोले तो  बोला पैसे देते जाओ | मैंने अपने पास से ५६ रु दिए  और पर्ची लेकर वहां से चले | धर्म शाला में आने के बाद कल के बारे में बात की | लगभग ११ बजे तक जागने के बाद बत्ती बुझाई | राजेश तब तक पहुंचे  नहीं थे | आज जिस कार्य को हो जाना चाहिए था यानी विद्यालय का चयन ,वह नहीं नहीं हो पाया था | ऑफिस में सोमलपुर , चैनपुरा , फ़तेहपुरा ग्रामों की चर्चा ही होती रही | वही अनिश्चितता  अब भी हमारे साथ थी|
०८-०१-९७
प्रातः उठा तो पौने पांच बजे थे| सर्दी महसूस हो रही थी| इसलिए वापस आकर सोया | आँख खुली तो आठ बज चुके थे| साथियों को उठाया | नहाये बिना ही तैयार हुए | धर्मशाला के बाहर बस अड्डे स्थित एक दुकान पर कचौरी-चाय का नाश्ता किया | वहां से जुम्बिश कार्यालय पहुंचे | सत्यवीर का घर पता करते पंचायत समिति क्वार्टरों में पहुंचे | बातचीत में एक नए गाँव रामपुर का ज़िक्र आया | कार्यालय आए , वहां हंसराज आया और उसने राजेश के आने के बारे में बताया | दो दिन से गाँव के चयन के हमारे प्राथमिक उद्देश्य की पूर्ति भी नहीं हो पाई है |आखिर वहां से चलना तय हुआ |जीप द्वारा रवाना हुए | मांगलियावास पहुंचना था | वहां से पहले एक स्टैंड पर रश्मि व्यास आती दिखाई दी तो उनसे बात करने के लिए जीप से उतरा  फिर वे हमारे साथ ही जीप में बैठी | मांगलियावास उतर कर अगली जीप में बैठ-लटक कर बिड़कचियावास पहुंचे | वहां चार बजे तक इंतजार करना पड़ा |मीना व राजेश गाँव में जाकर आए | हम वहीँ बस अड्डे पर बैठे| वहां माधोराम ने चाय पिलाई | वहां से रवाना होने से पहले देखा कि घुमंतू परिवारों के बच्चे सिक्कों को कंचों की तरह इस्तेमाल कर पत्थर से निशाना बनाकर निश्चित रेखा से बाहर निकालने का खेल खेल रहे थे | वहां से बस पकड़ी |  तब ४ बजे थे| बिड़कचियावास से  मै और मीना बिठूर गाँव में उतरे | बाक़ी लोग भवानी खेडा जाने थे | मीना और  मैं लक्ष्मण   के घर आए | वहां से साइकिलों पर अगले गाँव काला बाग पहुंचे | रास्ते में मीना ने पास की पहाड़ियों में  चोरी-छिपे निकाले जाने वाले पन्ना के बारे में बताया |काला बाग अड्डे पर पहुंचे तो हेडा के साथ हजारी था | मीना, हेडा और मैं कृषि विभाग की पास से गुज़र रही  जीप  द्वारा राजगढ़ में विस्तार केंद्र पहुंचे | केंद्र के सामने स्थित घर से चाभी लेकर दरवाज़ा खोला | कुछ देर बाद राजेश , राजेंद्र और हरीश भी आ गए | हजारी ने खाना बनाने वाली बाई का प्रबंध किया | चाय बनाई गई | थोड़ी देर बाद खाना बनाने का कार्य भी हो गया | मैंने  अपने दो-तीन दिन से मैले हो रहे  कपड़े धो लिए | रात को थोड़ी देर विचार  -विमर्श किया | जिसमे चैनपुरा को कार्य केंद्र बनाने का निश्चय  हुआ | भूरालाल और शिव दयाल शेखावत थोड़ी देर पहले आकर गए थे | सुशीला और पुष्पा नाम की दो  कार्य कर्ता वहां आयीं | खाना पकाने में दोनों का सक्रिय योगदान था | अभी भी लीडी बिठूर के नाम लिए जा रहे थे |

९-१-९७
जब उठा तो ५-२० हो रहे थे | एक बार फिर सर्दी से लड़ने की हिम्मत नहीं थी सो रजाई की शरण में आ गया | पानी आया तो उसके हौज में गिरने की आवाज़ सुनकर तन्द्रा भंग हुई | ताज़े पानी से नहाया | मुझे नहाता देख कर शायद राजेश की भी हिम्मत हो गयी थी जो पहले उनके मुंह , हाथ, बाल  धोते समय दिखाई नहीं पड़ रही थी | सुशीला और पुष्पा सुबह से ही सक्रिय थी | चाय उन्होंने बना दी थी | विस्तार केंद्र से निकलते-निकलते दस से ऊपर समय हो चुका था | इस बीच खाना पकाने वाली बाई ने खाना बना और  खिला दिया था | हमने चर्चा भी कर ली थी |चैनपुरा के बारे में काफी कुछ लोग बोल चुके थे कि जिसे देखो वह चैनपुरा जा रहा है | चाहे बोर्डिया जी हों या कलक्टर | मेरे मन-मस्तिष्क में चैनपुरा स्कूल की बड़ी ही साफ़-सुथरी छवि  बन गयी थी |विस्तार केंद्र से निकलते ही जा रहे एक ट्रक को रुकवाया |उससे राजेश ,मीना , राजेंद्र , हरीश और मैं सवार होकर चैनपुरा मोड़ पर उतरे |  वहां से पैदल चलते हुए जब विद्यालय परिसर पहुंचे तो ११-१० हो रहे थे पर जैसे गेट के अन्दर प्रविष्ट हुए मन में विद्यालय की बनी छवि को झटका लगा | वहां किसी आम-साधारण स्कूल की तरह ही कागजों के टुकड़े  इधर-उधर बिखरे पड़े थे | पत्थर गिट्टी का बिखरे रहना तो प्राकृतिक है ही |कुछ देर ऑफिस में बैठे | चार्ट पर लिखी  स्टाफ और लोक जुम्बिश परियोजना सम्बन्धी सूचनाएँ पढ़ीं| सत्यनारायण टेलर जो यहाँ प्रधानाध्यापक हैं मौजूद नहीं हैं |बाक़ी टीचर्स अपनी-अपनी कक्षाओं में व्यस्त हैं |दूसरे कालांश  में जब चौथी कक्षा में मैं और बाक़ी अन्य  में थे तो नोट किया कि बच्चों के लिए बैठने को दरी नहीं है | बच्चे [संभवतः अपने घरों से लाये हुए टाट-बोरियों के टुकड़ों पर बैठे हैं |जिन पांच बच्चों के पास कुछ भी नहीं है वे यों ही बैठे हैं और ठन्डे फर्श पर ज्यादा देर तक नहीं बैठा जाता तो उकडू हो जाते हैं | मधु गणित पढ़ा रही थी ,उनके हाव-भाव से मेरी उपस्थिति उन पर बोझ लग रही थी |वे लीटर-मिली लीटर के बारे में पढ़े रही थीं  | पीछे वाले बच्चों पर उनका ध्यान नहीं था | जिस बालक को बोर्ड पर बुला कर प्रशन  हल करवाने की कोशिश कर रही थी तो पीछे के बच्चे पिछले दरवाजे से बाहर झाँक रहे थे और बाहर सड़क पर जा रहे मुनादी करते लाउड स्पीकर की आवाज़ पर उनका ध्यान था | मधु ने दरवाज़ा बंद किया तो उन्होंने खिड़की खोल ली |फिर शैतान सिंह बाहर चला गया | कुछ देर बाद दूसरा भी चला गया | पहला कुछ देर बाद आ गया | यह तो मेरा चौथी कक्षा का अवलोकन रहा | इसके बाद पहली कक्षा में चला गया | वहां गिनती कार्य चल रहा था | हाफ टाइम में समस्त स्टाफ के साथ पढ़ने पर चर्चा की | आधी छुट्टी  के बाद चौथी कक्षा में गया और १-२ नम्बर गेम खेलाया | उसके बाद बच्चों से गाने , नाच करवाकर उनकी क्षमता के बारे जाना | करीब पांच बजे विद्यालय से रवाना हुए | शाम को पैदल निकाले रास्ते में मुन्नी बाई ,पंचायत का समिति सदस्य का घर पड़ता है | शेखावत ने उस ओर का रुख  कर लिया | उन्होंने वहां चाय बनवा ली | हम राजगढ़ के लिए एक ट्रक में लटक गए | रास्ते में बबूल की डालियाँ   शरीर को अपनी उपस्थिति बता रही थीं | गंतव्य रोड से ट्रक उतरा और नया गाँव पहुँच गया  | कुछ देर ठहर कर फिर वहां से चला और सवा सट बजे विस्तार केंद्र पहुंचे |अनीता  खाने की तैयारी में आलू छील रही थीं | राजेंद्र ने आटा  गूंथा | खाने के बाद चर्चा चल रही थी तो १०-१५ पर सलीम पहुंचे  | ग्यारह बजे वे रुखसत हुए | फिर १२ बजे तक चर्चा कर सोने की तैयारी की |

१०-०१-९७

उठते समय ५-३५ थे | चाय-पोहे के नाश्ते के बाद राजेंद्र के साथ भूरा लाल के क्वार्टर की ओर ९-३५ पर निकले | वहां से मोपेड पर चैनपुरा पहुंचे तो १० में कुछ बाक़ी था | कुछ बच्चे पहुंचे थे राजेंद्र ने उन्हें खेल खेलाये | साढ़े दस पर विद्यालय स्टाफ ने ही प्रार्थना करवाई | पहले कालांश में विद्यालय स्टाफ ही पढ़ा रहा था | दूसरे में हम अलग-अलग कक्षाओं में गए | मै  चौथी  में गया | वहां गणित में ली-मिली का पाठ चल रहा है | मैं इसी बारे कुछ सोच कर गया था | बच्चो से उनके घर , पशु, मवेशी ,किस प्रकार दूध दुहा जाता है ...आदि के  बारे में प्रशन पूछे | हिंदी में 'भूरी बिल्ली' कहानी को एक्ट  कर  के पढाया | हाफ टाइम के बाद १२ के कार्यक्रम के लिए छांटे गए बच्चों से तैयारी की शुरुआत की | इसी गाँव के लाडू सिंह जो सेवा निवृत्त अध्यापक हैं हमारे साथ बैठे | वे इस आयु में भी शिक्षा के प्रति समर्पित लगे | उन्होंने बताया कि स्टाफ [विशेष कर शिक्षिकाएं ] को रविवार को रात्रि में होने वाले कार्यक्रम में आने  के लिए मना लिया है |उन्हें उसी रात अजमेर , या नसीराबाद जहाँ से भी वे आते है छुडवा दिया जायेगा | उनके बहाने से हमारा गाँव वासियों से मेल जोल का ऑब्जेक्टिव पूरा हो रहा था | शाम को पांच बजे विद्यालय से चले और विस्तार केंद्र आए |नाटक ,गीत के बारे में राजेश और राजेंद्र से चर्चा की | राजेश ने अनौपचारिक   शिक्षा केंद्र की लड़कियों को भी कार्यक्रम में लेने की बात कही | इस बीच शिवदयाल आए और तैयारी सम्बन्धी कुछ सामग्री रख गए |

११-०१-१९९७

सुबह साढ़े सात बजे नहा लिया था | नाश्ते में मीठा -इलायची युक्त दूध था |भोजन करके राजेंद्र, हरीश और मैं भूरालाल की मोपेड से चैनपुरा पहुंचे| राजेंद्र ने फिजिकल एक्टिविटिज़ बच्चों को करवाई |प्रार्थना सत्र के बाद जब कार्यालय में चाय बनाई जा रही थी तब देखा कि कक्षा में रेशमा देरी से आने पर एक बालक और एक बालिका से उठक-बैठक निकलवा रही थी | बालिका को ऐसे दंड के बारे सुना ज़रूर था पर देख पहली बार रहे थे | यह अच्छा मने जाने वाले स्कूल का उदाहरण है तो ख़राब में जाने क्या होता होगा !वहां से एक साथ बच्चों को लेकर लाडू सिंह जी के मकान में पहुंचे| वह उनका अतिरिक्त मकान था जो ज्यादा उपयोग में नहीं लिया जा रहा था  | इससे पहले भूरालाल के साथ आते हुए  गाँव वासी से बातचीत  देखी तो पुरुष और महिला सदस्यों को एक दूसरे से हाथ मिलाते देखा | मेरे लिए यह रोचक अनुभव था | गाँव वासी बता रहे थे कि पांचवी के स्कूल में अब वो बात नहीं रही जो कुछ साल पहले तक थी | मैंने बच्चों को ' ये है मेरा हिंदुस्तान ...' गीत सिखाने की कोशिश की |  तभी राजेश का मैसेज आया कि ऊपर छत पर नाटक वाले बच्चों के साथ काम करना है  | मैं छत पर आ गया | बच्चे उत्सुक और उत्साही नहीं दिख रहे थे |कुछ  कोशिश के बाद उन्होंने शुरू किया तो उनमे अपने -अपने संवाद पर पकड़ आ गयी |आज दिन और रात में गाँव के लोगों से मिलने का मौका मिला | एक घर में वृद्धा की मृत्यु पर शोक प्रकट करने गए तो उनके बेटे ने  स्कूल में माताजी के नाम पर प्याऊ बनवाने की सार्वजनिक घोषणा की | रात को कमरे में चाय पीकर ८ बजे चैनपुरा के अनौपचारिक शिक्षा केंद्र पहुंचे |इसके बाद तीन और जगह जाने वाले चले | जगहें थीं , शिवपुर , सरदारपुरा और चाट | मैं और अनीता शिवपुरा मुन्नीबाई के केंद्र पहुंचे | सर्दी के कारण दरवाज़ा अन्दर से बंद था | खुलवाया | परिचय में लड़कियों के रोचक नाम मिले ...जनता, गमानी , जमला आदि | रात १०-२५ तक वहां रहे | राजेश और राजेंद्र वहां  आए | ग्यारह बजे राजगढ़ पहुँच गए | भूरालाल के निवास आए वहां वे और अनीता सब्जी बनाने में व्यस्त थे | खाना खाते-खाते साढ़े बारह के आसपास हो गए थे | विस्तार  केंद्र पर एक बजे आए |

१२-१-१९९७

रात को देर से सोने के बावजूद ६ बजते ही आँख खुल गयी | खाना खा कर निकलते-निकलते १० से ऊपर हो गए थे | जुगाड़ में मुझे और राजेन्द्र को शेखावत ने बिठाया | भवानी खेडा उतरे | एक खेत में चड़स से की जा रही सिंचाई को काफी समय बाद देखा |खेत वालो से बात की | ताज़ा गाजर खायी | वहां से घूमते फिरते चैनपुरा आये | दिन में बच्चों को फिर तैयारी ही करवाई | बच्चों के साथ काफी मस्ती की | स्वयं  को ऐसा लग रहा है मानो हम काफी समय से चैनपुरा में हों |संजय ने दोपहर बाद आवाज़ लगाई तो उन के साथ क्रिकेट खेली | लौटने तक पांच बजे थे | ६ बजे लाडू सिंह जी के मकान में आए | राजगढ़ विस्तार केंद्र से लाया भोजन तैयार था | कार्यक्रम स्थल गाँव के 'हथाई' पर पहुंचे | समय पौने सात हो गए थे | पचास-साठ बच्चे ही बैठे थे | मुझे ऐसा लगा कि ये बच्चे ही हमारे कार्यक्रम के दर्शक होंगे | सवा सात बजे कार्यक्रम का मंच सञ्चालन भूरालाल ने शुरू किया | शुरुआत सरस्वती वंदना से ,फिर ' ये है मेरा वतन...,नृत्य, गीत वगैरह  विद्यालय के बच्चों ने ही प्रस्तुत किये |  कुछ योगदान एन एफ़ ई  केंद्र कि बच्चियों का रहा | कक्षा ४ के बच्चों ने अपनी हिंदी पुस्तक के पाठ 'दावत रसगुल्ले की..' का मंचन किया | बाद की प्रस्तुति में नाटक 'शराबी ' जो हमारा मुख्य उद्देश्य था , रही | शायद यह लोगों को अच्छा लगा क्योंकि इसके बाद उनमे ५१ रु, २१ रु, इत्यादि देने वालों का सिलसिला चल गया | राजेश ने संबोधन में गाँव और संधान के बारे में बताया | राजेन्द्र और मैंने भी दो प्रस्तुतियां दिन | कार्यक्रम लगभग ग्यारह बजे समाप्त हुआ | अजमेर से आने वाले स्टाफ की जीप में हम भी सवार हो गए | रास्ते में जीप चालक ने मुख्य मार्ग पर खड़ी जीपों, कारों के बारे में पूछने पर बताया कि यहाँ राजगढ़ में नाइयों के किसी घर के व्यक्ति में 'भैरों जी' आते हैं | सभी के उसे देखने कि जिज्ञासा हो आयी |   राजगढ़ विस्तार केंद्र  उतरे | सबकी चाय की इच्छा हो रही थी | मैंने बनाई | चाय पीकर करीब बारह बजे हम सभी वहां आए | जिस युवक में 'भैरों' आने की बात कही जा रही थी वह श्मशान भूमि गया हुआ था | कुछ देर प्रतीक्षा के बाद वह कई लोगों के साथ वहां आ पहुंचा | आते ही कमीज़-बनियान उतार दिए |लाल रंग की गद्दी पर बैठा | लोहे की कड़ियों की सांकल  पीठ पर मारने लगा | मैंने गौर किया कि जब वह फर्श पर मरता तो जोर से और पीठ पर धीरे से मारता  | उसने घुटने पर चमड़े का पट्टा डाल रखा था जिस पर घुंघरू   बंधे थे | पांव हिलाने से वह बजते| कुछ देर बाद वह बंद हो गए | शायद उसका पांव थक गया था |फिर उसने लोगों के दुःख-दर्द दूर करने शुरू किये | इससे आगे हम उसे झेल नहीं पाए और वहां से चले | रात का डेढ़ बजा था जब विस्तार केंद्र आए |
१३-१-१९९७
सुबह सात -दस तक नहा कर तैयार था | कल के बारे में लिखा | पहली चाय साढ़े आठ बजे मिली | खाना खाकर  हरीश को सामान समेत भवानी खेडा पहुँचने का कह कर निकले |शेखावत के साथ उसके कमरे आए | वहां चाय पीकर करीब सवा ग्यारह बजे  चैनपुरा के लिए रवाना हुए | श्मशानभूमि के पास से होकर  छोटा रास्ता गुज़रता था | उधर से निकले | शेखावत राजेश के साथ आगे और राजेन्द्र के साथ मैं  कुछ पीछे |   सवा बारह बजे विद्यालय आए तो वहां लाडू सिंह जी आए हुए थे | हाफ टाइम में स्कूल स्टाफ को बुलवाया | उनसे प्रति क्रिया पूछी | कैलाश ने कार्यशाला का औचित्य पूछा तो हमारे बोलने से पहले ही लाडू सिंह जी बोले ''गाँव की औरतों द्वारा शराबी नाटक बहुत पसंद किया गया क्योंकि वो उन्हें खुद कि कहानी लगी |" मुझे लगा की हमारी मेहनत सफल हुई | हरदेवी ने कहा कि जिस प्रकार आप लोगों ने पद्य उस तरह  तो हम भी पढ़ा सकते हैं |ऐसा सुन कर हमारा वह उद्देश्य भी पूरा हो गया कि हमें शिक्षकों  को प्रेरित करना है और वे भी कर सकते हैं | वहां से चलते-चलते दो से ऊपर हो गए थे | पैदल भवानी खेडा आए | वहां भैरू सिंह नसीराबाद के कचौडों  के साथ हमारा इंतजार कर रहा था | वही चाय के साथ उन्हें निपटाया | टेम्पो से नसीराबाद और फिर अजमेर आए | बस अड्डे पर ही नन्दवाडा गया दल मिला | एक ही बस से जयपुर आए | बस में मिथलेश से नंदवाडा के अनुभव सुने |

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