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गुरुवार, 13 मई 2010

KARJO

कर्जो [लघुकथा]
कदी बण सुण्यो हो क '' यावत जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत'' |
बण तो अमल सरू कर दियो |... घर, मोटर साइकिल , टेलीविजन ,फ्रिज,...
सारी घरे कर ली पर करी कर्जे सूं |
किस्त  चुकाणी मुश्कल होगी| ब्याज पर ब्याज लागण लाग ग्यो |
कर्जो देवनिया आपरी चीज़ पाछी लेवणी चालू कर दी |
कई दिन ताई मानसिक परेशानी म रहर पाछे लोगां
अखबार में खबर देखी...'' कर्जे सूं दबेड़े तेल घाल र आग लगाईं|''

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