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रविवार, 9 मई 2010

aas

आस
[1]
हर शाम
विचारता हूँ
दिन भर किये हुए
कार्यकलाप
पर...
मिलती नहीं
संतुष्टि कहीं
मुझे मेरे कार्यों से
पसर जाता है
अँधेरा, गहरा सन्नाटा
भीतर तक कहीं
निर्विघ्न सन्नाटा
पर... 
सपनीला सफ़र
पूरा होते न होते
चढ़ जाता है दिन
भरता है उजास
ज़िन्दगी में
लगने लगता है
 आज कर जाऊँगा
कुछ न कुछ
जो होगा
सार्थक , कहीं न कहीं
किसी न किसी के लिए
और तभी जीवन की
समझ आने लगती है
सार्थकता
और पैदा होता है
फिर जीवन से लगाव

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